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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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पार्थिवप्रकरणम् १३७ प्रधानस्येति—सांख्यशास्त्र में भी 'पुरुष' को निर्विकार कहा गया है, उस कारण 'प्रधान' का परार्थ्य बताना उचित नहीं है। यदि 'पुरुष' को यथाकथञ्चित् सविकार भी कहा जाय तो भी प्रधान का पारार्थ्य [परार्थ होना] सिद्ध नहीं किया जा सकेगा ॥ ४८ ॥ हृदयस्पर्शिनी सांख्यशास्त्र ने भी प्रधान की जो परार्थता स्वीकार की है, वह भी पुरुष के निर्विकार होने के कारण युक्तियुक्त नहीं है। यदि प्रधान को पुरुष के भोग ओर अपवर्ग (मोक्ष) के लिये स्वीकार किया जाय तो पुरुष को विकारी मानना पड़ेगा, क्योंकि यदि प्रधान के व्यापार से उसमें कोई फल ही न हुआ तो प्रधान की पुरुषार्थता ही क्या हुई ? और पुरुष का स्वामित्व ही क्या रहा ? किन्तु सांख्यमत में पुरुष को निर्विकार माना गया है। इसलिये प्रधान उसका उपकारक नहीं हो सकता। यदि प्रधान के प्रति पुरुष का स्वामित्व सिद्ध करने के लिये पुरुष में यथा- कथञ्चित् विकार को स्वीकार कर लिया जाय, तो भी प्रधान की परार्थता नहीं बन पा रही है। क्योंकि 'जो विकारवान् होता है, वह अनित्य होता है' इस नियम के अनुसार पुरुष को अनित्य मानना होगा, तब अनित्य पुरुष, नित्य प्रधान का उपकार्य नहीं हो सकेगा। अतः प्रधान, पुरुष के लिये है—यह नहीं कहा जा सकता ॥ ४८ ॥ सम्बन्धानुपपत्तेश्च प्रकृतेः पुरुषस्य च । मिथोऽयुक्तं तदर्थत्वं प्रधानस्याचितस्त्वतः ॥४९॥ सम्बन्धेति—प्रकृति और पुरुष दोनों का परस्पर सम्बन्ध न हो सकने से और प्रकृति के जड़ होने से उसका पुरुष के लिये होना [परार्थ होना] कभी सम्भव नहीं है ॥ ४९ ॥ हृदयस्पर्शिनी प्रधान और पुरुष के सम्बन्ध का जो अभाव बताया गया है, उसी को पुनः स्पष्ट कर रहे हैं—पुरुष, असंग और उदासीन है और प्रकृति जड़ है, उस कारण उसकी (प्रकृति की) स्वतः प्रवृत्ति हो नहीं सकती। इसलिये उन दोनों का उपकार्योपकारक-भावसम्बन्ध होना असंभव है। एवं च सांख्य में प्रतिपादित प्रधान की परार्थता युक्ति-युक्त नहीं कही जा सकती। तात्पर्य यह है कि प्रकृति-पुरुष का परस्पर सम्बन्ध न हो सकने के कारण और प्रकृति के जड़ होने के कारण प्रधान (प्रकृति) का पुरुष के लिये होना कदापि संभव नहीं है ॥ ४९ ॥ क्रियोत्पत्तौ विनाशित्वं ज्ञानमात्रे च पूर्ववत् । निर्निमित्ते त्वनिर्मोक्षः प्रधानस्य प्रसज्यते ॥५०॥ क्रियेति—पुरुष में क्रिया की उत्पत्ति यदि मानते हैं, तो पुरुष में विनाशित्व प्राप्त होता है और यदि उसमें केवल ज्ञानमात्र क्रिया का होना स्वीकार करते हैं तो पूर्वोक्त दोष प्राप्त होता है। अर्थात् पुरुष तो कूटस्थ है, उस कारण प्रधान के व्यापार से पुरुष का कोई उपकार नहीं हो सकता। यदि प्रधान की प्रवृत्ति निर्निमित्त ही माने तो पुरुष का कभी मोक्ष ही नहीं हो सकेगा ॥५०॥ हृदयस्पर्शिनी पुरुष में यत्किञ्चित् क्रिया की उत्पत्ति मानने पर उसका विनाशित्व सिद्ध होता है। क्योंकि ऐसी व्याप्ति (नियम) देखी जाती है—'यत् क्रियावत् तदनित्यम् यथा घटादि'। और सांख्य ने तो पुरुष को नित्य माना है। इस पर यदि कोई कहे कि पुरुष में परिस्पन्द या परिमाणरूप क्रिया मानने पर अनित्यत्व प्रसंग हो सकता है, किन्तु हम (सांख्य) परिस्पन्द या परिमाणरूप क्रिया का होना पुरुष में नहीं मानते। हम तो उसमें ज्ञानक्रिया को ही मानते हैं। तथापि पुनः यह प्रश्न होगा कि उस ज्ञान को जन्य मानते हो या अजन्य ? यदि जन्य ज्ञान का उससे सम्बन्ध कहो तो विकारित्व प्राप्त होने से अनित्यत्वापत्ति होगी। यदि अजन्य ज्ञान (नित्य ज्ञान) का उससे सम्बन्ध कहो तो प्रधान के व्यापार से पुरुष पर कोई उपकार नहीं हुआ। अर्थात् प्रधान के प्रति उसकी (पुरुष की) स्वामिता १८