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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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१४६ उपदेशसाहस्री वह वस्तुतः तत्त्ववेत्ता (तत्त्वदृक्, तत्त्वदृष्टिसम्पन्न) नहीं है। क्योंकि श्रुति कह रही है—‘तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदि- दमुपासते’१ तथा ‘योऽन्यां देवतामुपास्तेऽन्योसावन्योऽहमस्मि इति न स वेद२ ॥ ७० ॥ अनेकजन्मान्तरसंचितैर्नरो विमुच्यतेऽज्ञाननिमित्तपातकैः । इदं विदित्वा परमं हि पावनं न लिप्यते व्योम* इवेह कर्मभिः ॥७१॥ अनेकेति—इस परम पवित्र आत्मतत्त्व का ज्ञान प्राप्त कर ज्ञानी पुरुष, जन्म-जन्मान्तर के सञ्चित अज्ञानजनित पापों से मुक्त हो जाता है, तदनन्तर पुनः वह इस लोक में आकाश के समान कर्मों से निर्लिप्त रहता है ॥ ७१ ॥ हृदयस्पर्शिनी अत्यन्त प्रयत्न से लब्ध हुए ज्ञान का फल बता रहे हैं—इस परम पवित्र आत्मतत्त्व का ज्ञान प्राप्त कर मनुष्य जन्म-जन्मान्तर के संचित हुए अज्ञान से उत्पन्न होनेवाले पापों से मुक्त हो जाता है। तदनन्तर पुनः इस संसार के कर्मों से वह आकाश के ही समान लिप्त नहीं होता है ॥ ७१ ॥ प्रशान्तचित्ताय जितेन्द्रियाय च प्रहीणदोषाय यथोक्तकारिणे । गुणान्वितायानुगताय सर्वदा प्रदेयमेतत्सततं मुमुक्षवे ॥७२॥ प्रशान्तचित्तायेति—गुरु का भी यह कर्तव्य है कि जो अत्यन्त शान्तचित्त, जितेन्द्रिय, दोषशून्य, शास्त्रोक्त स्वधर्म का आचरण करने वाला, सद्गुणसम्पन्न और अपने अनुकूल रहने वाला मोक्षकामी शिष्य हो, उसी को सतत इस आत्मज्ञान का उपदेश करे ॥ ७२ ॥ हृदयस्पर्शिनी आचार्य का कर्तव्य बताते हैं—वह आचार्य गुरु अपने शिष्य को जब अच्छी तरह परख ले कि शिष्य अत्यन्त शान्तचित्त, जितेन्द्रिय, दोषरहित, शास्त्रप्रतिपादित स्वधर्म का अनुसरण करने वाला तथा गुरु की आज्ञा का श्रद्धा-भक्ति से पालन करने वाला, गुणवान्, और अपने अनुकूल रहने वाला है, तब उस मोक्षेच्छु शिष्य को ही३ इस आत्मज्ञान को सर्वदा दे, जिस किसी को शिष्य मानकर इस आत्मतत्त्व ज्ञान को न दे ॥ ७२ ॥ परस्य देहे न †यथाभिमानिता परस्य तद्वत्परमार्थमीक्ष्य च । इदं हि विज्ञानमतीव निर्मलं संप्राप्य मुक्तोऽथ भवेच्च सर्वतः ॥७३॥ परस्येति—जिस प्रकार एक पुरुष के शरीर में दूसरे पुरुष को अभिमान नहीं होता है, उसी प्रकार अपने शरीर में भी अभिमानरहित हो जाय। यह तभी हो सकता है कि जब वह इस शरीर में परमार्थतत्त्व का साक्षात्कार कर ले, तथा इस अत्यन्त निर्मल ज्ञान को प्राप्त कर ले तभी वह सब ओर से सर्वथा मुक्त हो सकता है ॥ ७३ ॥ हृदयस्पर्शिनी उपर्युक्त प्रकार का शिष्य महावाक्य के द्वारा ज्ञात कराये जाने वाले आत्मतत्त्व को किस प्रकार से अवगत कर पाता है ? और उससे उसे क्या फलप्राप्ति होती है ? जिस प्रकार अपने से भिन्न दूसरे पुरुष के शरीर में किसी पुरुष को अभिमान नहीं होता अर्थात् मैं-मेरा इस प्रकार अभिमान नहीं होता, उसी प्रकार अपने शरीर में १. (के. उ. ४, ५, ६, ७, ८) २. (बृ. उ. १।४।१०) ३. ‘शान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वात्मन्येवात्मानं पश्यति’—(बृ. उ. ४।४।२३ तथा गीता—६।३, २।६६, २।५८, १८।६६, २।१४, २।५३, १२।८, ४।३९, ४।४० तथा मोक्षधर्म प. ३१०।३५-३८ तथा भागवते ३।३२।३९-४२)

  • भवदेव क—पाठान्तरम् । † यथाहममानिता०—पाठान्तरम् ।