उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर
Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)
Page 173 of 364
Read in contextपार्थिवप्रकरणम् १४७ भी परमार्थतत्त्व का अर्थात् देहातिरिक्त आत्मतत्त्व का साक्षात्कार कर अभिमानरहित होता हुआ इस अत्यन्त निर्मल ज्ञान को प्राप्त कर पुरुष सर्वथा मुक्त हो जाता है। अर्थात् अज्ञान और उसके कार्यभूत संस्कारों से रहित होकर परमानन्दानुभवरूप ब्रह्मात्मस्वरूप हो जाता है ॥ ७३ ॥ न हीह लाभोऽभ्यधिकोऽस्ति कश्चन स्वरूपलाभात् स इतो हि नान्यतः । न देयमैन्द्रादपि राज्यतोऽधिकं स्वरूपलाभं त्वपरीक्ष्य यत्नतः ॥७४॥ नहीति—इस संसार में स्वरूपलाभ (आत्मलाभ) से बढ़कर अन्य कोई लाभ नहीं है। वह लाभ वेदान्त- वाक्यों से ही हो सकता है, किसी अन्य उपाय (साधन) से नहीं। अतः इस आत्मलाभ को, जो इन्द्रलोक के राज्य से भी बढ़कर है, उसे प्रयत्न पूर्वक परीक्षा किये बिना किसी को नहीं देना चाहिये ॥ ७४ ॥ हृदयस्पर्शिनी गुणविशेषविशिष्ट शिष्य की परीक्षा करने की गुरु को आवश्यकता क्यों होती है ? जिस किसी भी आये हुए शिष्य को यह आत्मविद्या क्यों नहीं दी जाती ? इस संसार (देव-मनुष्यादि जन्मपरंपरा) में आत्मतत्त्वज्ञान (स्वरूपलाभ) से बढ़कर कोई दूसरा लाभ नहीं है१। और वह लाभ वेदान्तवाक्यों से ही हो सकता है, अर्थात् तत्त्व मस्यादि वाक्य का पदार्थविवेक करनेवाले मुमुक्षु को ही निःसंदिग्ध (निर्विचिकित्स) ‘अहं ब्रह्म’ इस प्रकार साक्षात्कार- रूप ज्ञान, जो वेदान्तवाक्य से उत्पन्न हुआ है, वही मोक्ष प्राप्त कराने में हेतु होता है; किसी अन्य शास्त्रान्तरों से नहीं होता है। इस कारण शिष्य की प्रयत्नपूर्वक परीक्षा किये बिना इस स्वरूपलाभ कराने वाले ज्ञान को नहीं देना चाहिये। क्योंकि यह लाभ इन्द्रलोक के राज्य से भी कहीं अधिक बढ़कर है। अतः ऐसे-वैसे किसी भी अनधिकारी शिष्य को यह ज्ञान कभी भी न दे। श्रुति ने भी यही आज्ञा दी है२ ॥ ७४ ॥ ॥ इति षोडशम्पार्थिवप्रकरणं समाप्तम् ॥ १. ‘आत्मलाभान्न परं विद्यते’—(आप. ध. १।२२।२) २. ‘प्राणाय्याय वान्तेवासिने नान्यस्मै कस्मैचन यद्यप्यस्मा इमामद्भिः परिगृहीतां धनस्य पूर्णां दद्यादेतदेव ततो भूयः’—(छां. उ. ३।११।६)