उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर
Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)
Page 177 of 364
Read in contextसम्यङ्मतिप्रकरणम् १५१ वह अविद्यानाशरूपी मोक्ष, 'ज्ञान' से ही हो सकता है; 'कर्म' से नहीं, क्योंकि ज्ञान ही अज्ञान का विरोधी है; कर्म नहीं। तस्मात् सर्वकर्मपरित्याग करके आत्मज्ञान का संपादन करे ॥ ७ ॥ कर्मकार्यस्त्वनित्यः स्यादविद्याकामकारणः । प्रमाणं वेद एवात्र ज्ञानस्याधिगमे स्मृतः ॥ ८ ॥ कर्मेति—कर्म से उत्पन्न होनेवाला फल (कर्मकार्य) अनित्य होता है, अविद्याजनित कामना ही उसकी कारण होती है। इस ज्ञान की प्राप्ति (अधिगम) में वेद को ही प्रमाण माना गया है ॥ ८ ॥ हृदयस्पर्शिनी विरोध न रहने से कार्यसहित अविद्यानिवृत्तिरूप मोक्ष, कर्म के द्वारा भले ही न हो, तथापि स्वर्गप्राप्ति के समान कर्म के द्वारा नित्य पुरुषार्थ रूप मोक्ष की प्राप्ति हो जायगी, तब ज्ञान की क्या आवश्यकता ? इस शंका का समाधान यह है कि कर्म का फल अनित्य होता है, क्योंकि अविद्याजन्य कामना (इच्छा) ही उसमें हेतु है। ज्ञानसाध्य फल ही नित्य होता है, इसमें वेद ही प्रमाण हैं। तथाहि—'तद्यथेह कर्मजितो लोकः क्षीयत एवमेवामुत्र पुण्यजितो लोकः क्षीयते' १, 'ब्रह्मविदाप्नोति परम्' २, 'तरति शोकमात्मवित्' ३ इत्यादि वेदवाक्यों को ही विद्वानों ने कर्मसाध्य के अनित्य होने में तथा ज्ञानसाध्य मोक्ष के नित्य होने में प्रमाण माना है ॥ ८ ॥ ज्ञानैकार्थपरत्वात्तं वाक्यमेकं ततो विदुः । एकत्वं ह्यात्मनो ज्ञेयं वाक्यार्थप्रतिपत्तितः ॥ ९ ॥ ज्ञानेति—वह वेद वस्तुतः एकवाक्य ही है, क्योंकि उसका, 'ज्ञान' ही एकमात्र फल है। उस एकवाक्य [महा- वाक्य] के अवान्तरवाक्य और महावाक्य के अर्थज्ञान से आत्मा की एकता ही जाननी चाहिये। अर्थात् ब्रह्मात्मैक्यज्ञान प्राप्त करना चाहिये ॥ ९ ॥ हृदयस्पर्शिनी किंच—सम्पूर्ण वेद, अध्ययन-विधि से उपात्त होने के कारण उसका अपुरुषार्थ में पर्यवसान न होने से, परमपुरुषार्थ में ही पर्यवसान कहना होगा। तब सम्पूर्ण वेद को आत्मैक्यज्ञानपरक समझना होगा, जिससे उसका महातात्पर्य 'कर्म' में नहीं हो सकेगा। वाक्यप्रमाणकोविद लोग वेद को एकवाक्यरूप मानते हैं, क्योंकि ज्ञान ही उसका एकमात्र प्रयोजन है। वेद के 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' आदि अवान्तर वाक्यार्थप्रतिपत्ति द्वारा 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्यों से आत्मा का एकत्व ही ज्ञेय है अर्थात् ब्रह्मैकत्व ज्ञेय है। क्योंकि आत्मतत्त्वज्ञान ही परम पुरुषार्थ का हेतु है। कर्मकाण्ड भी तत्त्वज्ञान के लिये अपेक्षित चित्तशुद्धि में हेतुभूत कर्मविधान द्वारा परम्परया परमपुरुषार्थ के साधन के रूप में स्वीकृत होता है। उस कारण एकार्थ में ही पर्यवसान होने से वेदवाक्य को एक ही वाक्य मानना युक्तियुक्त है ॥ ९ ॥ वाच्यभेदात्तु तद्भेदः कल्प्यो वाच्योऽपि तच्छ्रुतेः । त्रयं त्वेतत्ततः प्रोक्तं रूपं नाम च कर्म च ॥ १० ॥ वाच्यभेदादिति—वाच्य (अर्थ) के भेद से शब्द (वाचक) भेद होता है, और शब्दभेद से वाच्यभेद की कल्पना की जाती है। अतएव भगवती श्रुति ने समस्त प्रपञ्च को नाम, रूप और कर्म त्रयरूप कहा है ॥ १० ॥ १. (छां. उ. ८।१।६) २. (तै. उ. २।१) ३. (छां. उ. ७।१।३)