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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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१५२ उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी यदि कहें कि 'आत्मा', 'ब्रह्म' आदि शब्द एक-दूसरे के पर्याय न होने के कारण उनके वाच्य 'आत्मा' और 'ब्रह्म' में अभेद नहीं हो सकता, अर्थात् 'आत्मा' और 'ब्रह्म' दोनों में एकत्व (ऐक्य) ज्ञान का होना उपपन्न नहीं हो सकता। किन्तु यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि वाच्यों के भेद से शब्दभेद और शब्दभेद से वाच्यभेद की कल्पना करने पर ही वाच्यभूत जीव-ब्रह्म का भेद होने पर तद्वाचक दोनों शब्दों का अपर्यायत्व सिद्ध होता है। तथा अपर्यायत्व के सिद्ध होने पर वाच्यरूप जीव-ब्रह्म का भेद सिद्ध हो पाता है। अतः अन्योन्याश्रय (इतरेतराश्रय) दोष उपस्थित होता है। अभिप्राय यह है कि स्वरूपतः (स्वरूप से) भेद की कल्पना करने में कोई प्रमाण नहीं है। इस पर प्रश्नकर्ता ने पुनः प्रश्न किया कि यदि भेद के अप्रामाणिक होने से एकत्व ज्ञान को उपपन्न कहो तो भेद भी प्रमाणसिद्ध है। क्योंकि “त्रयं वा इदं नाम रूपं कर्म” १ इस श्रुति ने उस आत्मा के अतिरिक्त (भिन्न) रूप, नाम और कर्म भी बताये हैं। अतः अनेकत्व (भेद) ही वेदार्थ है। उस पर सिद्धान्ती, भेदवाद का खण्डन कर एकत्व को सिद्ध कर रहा है—वह कहता है कि 'त्रयं वा इदं नाम रूपं कर्म' इस श्रुति में समस्त शब्दविशेष का वाङ्मात्रत्व, रूपविशेष का चक्षुर्मात्रत्व, और कर्मविशेष का शरीर- मात्रत्व बताया गया है। ये तीनों एक दूसरे से कल्पित हैं अर्थात् परस्परसापेक्षसिद्धि वाले हैं। इसलिये ये तीनों असत् हैं। भेद अन्योन्याश्रयदोष से ग्रस्त होने के कारण उस (भेद) को वस्तुतः जानना शक्य नहीं। अतः उसमें प्रामाणिकता नहीं है, तथापि कथञ्चित् लोकव्यवहारसिद्ध जो मिथ्या भेद है, उसीका केवल अनुवाद मात्र श्रुति ने वैराग्य पैदा करने के लिये किया है। अतः अद्वैत ज्ञान के होने में कोई विरोध नहीं है। अथवा—सम्पूर्ण वेद को एकार्थज्ञानपरक होने मात्र से एकवाक्य कैसे कहा जा सकता है? क्योंकि अपुनरुक्त शब्दभेद के कारण अर्थभेद की प्रतीति हो रही है। ऐसी शंका यदि कोई करे तो सिद्धान्ती कहता है कि शंका करने वाले की शंका करना उचित है, तथापि उन अपुनरुक्त शब्दों का तात्पर्य अर्थभेद में नहीं है। क्योंकि भेद (द्वैत) तो प्रमाणों से, युक्तियों से बाधित हो चुका है। वाच्यभेद के प्रामाणिक रहनेपर उसमें तात्पर्य रखने वाले शब्दों के भेद से अनेक वाक्य सिद्ध हुआ करते हैं। वाच्यभेद भी वाचक- शब्दभेद के श्रवण से कल्प्य है, अन्यथा वाच्यभेद को सिद्ध करने का अन्य कोई प्रकार नहीं है। अर्थतत्त्व का निश्चय करना शब्द के अधीन नहीं होता, क्योंकि आरोपित विषय में भी शब्दभेद (भिन्न शब्द) दिखाई पड़ते हैं तथा शब्द- निश्चय करना भी अर्थ के अधीन नहीं है, क्योंकि एक ही पुरुष व्यक्ति में पिता, भ्राता, मातुल, जामाता, पितृव्य इत्यादि उपाधिभेदों से अपुनरुक्त शब्दभेद दिखाई देते हैं। उक्त उदाहरण में प्रतियोग्युपाधिभेद के बिना वस्तु का भेद नहीं हुआ है। तथाच अनादि अविद्या से कल्पित अनेक उपाधियों के भेद से युक्त अनेक कर्त्रादि कारक भेद का अनुवाद कर, ज्ञान के लिये अपेक्षित अन्तःकरणशुद्धि के साधनभूत कर्मविधिपरक होने से कर्मकाण्ड और आत्मतत्त्व- ज्ञानकाण्ड के वाक्यों की एकवाक्यता उपपन्न हो जाती है। और निरतिशयानन्द तथा आत्यन्तिक दुःखनिवृत्तिरूप फल की इच्छा सभी को स्वाभाविक रूप से रहती है। उस इच्छा की पूर्ति का उपाय एकमात्र आत्मतत्त्वज्ञान ही है, उसके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं है। अतः अविद्या के समान अवस्थारूप उपाधि के भेद से अधिकारी का भेद और प्रयोग का भेद उपपन्न हो जाता है। एवं च एकपुरुषापेक्षित एकमात्र परमपुरुषार्थ के एकमात्र साधन का प्रकाशक होने से वेद की एकवाक्यता (वेद को एक महावाक्य) कहना उचित ही है। इस रीति से द्वैत के अविद्याकल्पित होने में युक्ति बताकर अब प्रमाण भी बताते हैं। जबकि इस प्रपञ्च के आकारभेद का निरूपण नहीं किया है, उस कारण यह जो सम्पूर्ण दृश्य नाम, रूप और कर्म है, इन तीनों को सामूहिक रूप में (राशि के रूप में) श्रुति ने कह दिया है। और हेतु बताते हुए तत्तद्विशेषों का प्रविलापन कर अर्थात् भेद का निराकरण कर उसे सामान्य रूप से इनका त्रित्व बता कर ये तीनों (यह त्रय) एकमात्र 'सत्' आत्मा ही है, इस प्रकार अन्त में यह स्पष्ट बताया है कि यह एकमात्र सत्स्वरूप आत्मा ही है, ये तीन नहीं हैं और यह सम्पूर्ण जगत् एक आत्मस्वरूप ही है, इसमें तात्त्विक भेद नहीं है ॥१०॥ असदेतत्त्रयं *तस्मादन्योन्येन हि कल्पितम् । कृतो †वर्णो यथा शब्दाच्छ्रुतोऽन्यत्र धिया बहिः ॥११॥ १. (बृ. उ. १।६।१ )

  • यस्मा—पाठान्तरम् । † रूपां०—पाठान्तरम् ।
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