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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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१५४ उपदेशसाहस्री होने के कारण आत्मा ही बोधक है और समस्त कल्पनाओं के अपवाद (बाध) की अवधि होने के कारण वह आत्मा ही बोध्य है, यह समझना चाहिये ॥ १३ ॥ येन वेत्ति स वेदः स्यात्स्वप्ने सर्वं तु मायया । येन पश्यति तच्चक्षुः शृणोति श्रोत्रमुच्यते ॥१४॥ येनेति—स्वप्नावस्था में पदार्थों का ज्ञान जिसके द्वारा होता है, उसे वेद (आत्मा) कहते हैं। उस स्वप्न में जो वेद्य (ज्ञेय) है, वह भी माया से कल्पित है, उसे देखने वाला (स्वप्नद्रष्टा) वह आत्मा ही है। उस समय जिसके द्वारा वह आत्मा (जीव) देखता है, उसे चक्षु कहते हैं और जिसके द्वारा वह सुनता है, उसे श्रोत्र कहते हैं ॥ १४ ॥ हृदयस्पशिनी इसी कथन को स्वप्न का दृष्टान्त देकर समझाते हैं—वही पूर्वसिद्ध आत्मा, आद्य (वेद) और वेद्य है। स्वप्नावस्था में जिसके द्वारा समस्त स्वाप्न पदार्थों का ज्ञान होता है, वही वेद है। स्वप्न में चिदात्मा के अतिरिक्त अन्य कोई भासक नहीं है। उस समय आदित्यादि ज्योतियों का उपरम रहता है। यह आत्मा तो स्वयं ज्योतिःस्वरूप१ है। उस स्वप्नावस्था में जो भी कुछ है वह सब माया के कारण वेद्य है। अतः वह आत्मा भी वेद्य है। स्वप्न में अवकाश न रहने से कोई बाह्य विषय नहीं रहता। तथाच (आत्मा की) स्वसाक्ष्यभूत मायाकृत उपाधि के भेद से युक्त हुआ वह आत्मा ही अपने से (आत्मना) वेद्य होता है। और उसमें अनुस्यूत चिद्रूप से वेदनरूप भी होता है, इस प्रकार 'वेद्य-वेदितृभाव' मायिक है। स्वप्नावस्था में चक्षुरादि इन्द्रियों का उपरम होने से स्वप्नगत आत्मा, जिससे रूप देखता है, वही चक्षु है ऐसा समझना चाहिये । तथा जिसके द्वारा सुनता है, वह श्रोत्र कहलाता है ॥ १४ ॥ येन स्वप्नगतो वक्ति सा वाग्घ्राणं तथैव च । रसनस्पर्शने चैव मनश्चान्यत्तथेन्द्रियम् ॥१५॥ येनेति—जिसके द्वारा स्वप्न में बोलता है, वह वाणी है, और जिससे सूँघता है, वह घ्राण कहलाता है। इसी प्रकार रसना, त्वचा और मनरूप अन्य इन्द्रियों को भी समझना चाहिये ॥ १५ ॥ कल्प्योपाधिभिरेवैतद्भिन्नं ज्ञानमनेकधा । आधिभेदाद्यथा भेदो मणेरेकस्य जायते ॥१६॥ कल्प्येति—जिस प्रकार नील-पीत आदि उपाधियों के भेद से एक ही मणि में भेद की प्रतीति होने लगती है, उसी प्रकार स्वप्नकल्पित चक्षु-श्रोत्रादि विभिन्न उपाधियों के कारण यह एक ही 'ज्ञान' चाक्षुष ज्ञान, श्रावण ज्ञान आदि अनेक प्रकार के भेदों को प्राप्त हो जाता है ॥ १६ ॥ हृदयस्पशिनी एकरूप चैतन्य अर्थात् एक ही ज्ञान वेदादिरूप से अर्थात् वेद्य-वेदक-चक्षुरादि रूप से अनेक प्रकार के भेदों को कैसे प्राप्त होता है ? स्वप्न-कल्पित अनेक उपाधियों के कारण यह एक ही ज्ञान अनेक प्रकार के भेदों को प्राप्त हो जाता है। जैसे नील-पीतादि उपाधियों के भेद से एक ही स्फटिकमणि में अनेक भेदों की प्रतीति होती है। वस्तुतः ज्ञान एक ही है, किन्तु चक्षुःश्रोत्रादि विभिन्न उपाधियों के कारण चाक्षुष ज्ञान, श्रावण ज्ञान आदि विभिन्न रूप से व्यवहार किया जाता है ॥ १६ ॥ जाग्रतश्च *तथा भेदो ज्ञानस्यास्य विकल्पितः । बुद्धिस्थं व्याकरोत्यर्थं भ्रान्त्या तृष्णोद्भवक्रियः ॥१७॥ १. (बृ. उ. ४।३।९) ३. (बृ. उ. ४।३।९)

  • यथा०—पाठान्तरम् ।
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