उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर
Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)
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Read in contextसम्यङ्मतिप्रकरणम् १५५ जाग्रत इति—जिस प्रकार स्वप्न में कल्पित उपाधियों के कारण एक ही ज्ञान के अनेक भेद हो जाते हैं, उसी प्रकार जाग्रत् अवस्था के ज्ञान का भेद भी आरोपित है, जिसमें अज्ञानवश कामनाजनित क्रिया की प्रतीति होती है, और यह जीव (आत्मा) बुद्धि में स्थित विषय को आत्मगत (अपना) समझ कर व्यवहार करता रहता है ॥ १७ ॥ हृदयस्पर्शिनी जैसे स्वप्न में कल्पित अनेक उपाधियों के कारण निर्भेद ज्ञान समस्त व्यवहार के योग्य रहता है, उसी प्रकार जागरित में भी उसकी अशेष व्यवहारास्पदता उपपन्न है। अर्थात् जाग्रत् अवस्था के चिद्रूप ज्ञान का भेद भी आरोपित है। अज्ञान से आवृत आत्मा प्रथमतः बुद्धि की कल्पना करता है, तब बुद्धि के आवरण को धारण करता है और अविवेक के कारण भ्रान्त होकर बुद्धिस्थित अर्थ (पदार्थ) को स्वात्मगत समझ बैठता है, उस कारण तदनुसार व्यवहार करने लगता है अर्थात् भ्रमप्रयुक्त तृष्णादि (इच्छा) से उत्पन्न हानोपादानव्यवहाररूप क्रिया करता है। तात्पर्य यह है कि अविद्या के कारण उपस्थापित अन्तःकरण, परिणामावस्था को अवभासित करता हुआ अविवेक के कारण अनेकरूप प्रपञ्च की अपने में कल्पना करता हुआ व्यवहार करता रहता है ॥ १७ ॥ स्वप्ने तद्वत्प्रबोधे यो बहिश्चान्तस्तथैव च । आलेख्याध्ययने यद्वत्तद्द्द्वयोन्योन्यधियो*द्भवम् ॥१८॥ स्वप्न इति—जिस प्रकार स्वप्न में व्यवहार होता है, उसी प्रकार जाग्रत् में भी होता है। तथा स्वप्न में जैसे आन्तर-बर्हिभाव की कल्पना होती है, वैसे ही जाग्रत् में भी आन्तर-बहिर्भाव की कल्पना हुआ करती है। जिस प्रकार लोकव्यवहार में किसी कागज आदि पर क-ख-ग आदि वर्ण लिखे जाते हैं, उसी तरह उन वर्णों को पढ़ा जाता है अर्थात् पढ़ पाना, लिखने पर निर्भर है और लिखना पढ़ने वाले के पढ़ने पर (बोलने वाले के बोलने पर) निर्भर है। अतः वे दोनों ही परस्पर एक-दूसरे के ज्ञान द्वारा कल्पित होने के कारण मिथ्या हैं। वस्तुतः 'वर्ण' नित्य और विभु हैं। उनको पत्रादि पर लिखना अथवा पढ़ना संभव नहीं है। तथापि विभु वर्ण को रेखाओं के रूप में पत्र आदि पर लिखते ही हैं और उसे देख कर पढते भी हैं ॥ १८ ॥ हृदयस्पर्शिनी जिस प्रकार स्वप्न में व्यवहार होता है, वैसे ही जाग्रत में भी होता है। इसी तरह स्वप्न के समान जाग्रत् में भी अन्तर्बहिर्भाव की कल्पना की जाती है। अर्थात् अन्तर्बहिर्भाव से प्रकट होने वाला व्यवहार स्वप्नवत् कल्पित है। उसी में अन्य दृष्टान्त बताते हैं—जिस प्रकार स्वप्नावस्था में चित्त के भीतर कल्पना किये जाने वाले और बाहर इन्द्रियों द्वारा गृहीत होने वाले दोनों प्रकार के पदार्थ मिथ्या हैं, उसी प्रकार जाग्रत् अवस्था में भी दोनों प्रकार के पदार्थ मिथ्या हैं। लोक में जिस समय क, ख आदि वर्ण पत्र पर लिखे जाते हैं, उस समय उन वर्णों की अपेक्षा से उन्हें पढ़ा जाता है और उनके पाठ की अपेक्षा से लिखा जाता है। अतः वे परस्पर के ज्ञान द्वारा कल्पित होने के कारण मिथ्या हैं, क्योंकि वस्तुतः वर्ण विभु और नित्य हैं। उन निरवयव वर्णों को पत्रादि पर लिखना या पढ़ना संभव नहीं है। तो भी विभु वर्ण को रेखा के रूप में पत्रादि पर लिखते ही हैं और उसे देखकर पढ़ते भी हैं ॥ १८ ॥ यदाऽयं कल्पयेद्भेदं तत्कामः सन् यथाक्रतुः । यत्कामस्तत्क्रतुर्भूत्वा कृतं यत्तत्प्रपद्यते ॥१९॥ यदेति—यह जीवात्मा जिस समय भेद की कल्पना करता है, उस समय वैसी कामना वाला होकर वैसा ही संकल्प करता है। इस प्रकार कामना के अनुसार ही संकल्प करके अपने अनुष्ठित कर्म का फल पाता है ॥ १९ ॥ हृदयस्पर्शिनी बुद्धिनिष्ठ अर्थ का स्पष्टीकरण करते हुए “भ्रान्त्या तृष्णोद्भवक्रियः” (श्लो. १७) के द्वारा उक्त अर्थ को अधिक स्पष्ट कर रहे हैं—जिसे यह आत्मा पूर्वभ्रान्तिसंस्कारवशात् बुद्धि से आवृत्त हुआ अविद्या के कारण
- द्वयः—पाठान्तरम् ।