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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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भेद की कल्पना करता है, उस समय अध्यस्त विषय के प्रति उसके शोभन होने के कारण इच्छुक होता है और इच्छुक होने के कारण वैसा संकल्प करने लगता है। अर्थात् 'मैं इसे प्राप्त करूँगा' इस प्रकार अध्यवसायरूप संकल्प करता है। एवंच जैसी कामना, तदनुकूल संकल्प और तदनुसार कर्म, ततश्च तदनुरूप फल को प्राप्त करता है। अर्थात् कामना-संकल्प-कर्म-फल इस रीति से अन्योन्य की अपेक्षा से हेतु-फल के रूप में कल्पित संसार का अनुभव करता रहता है। श्रुति भी कह रही है—"अथो खल्वाहुः काममय एवायं पुरुष इति स यथा कामो भवति तथा क्रतुर्भवति, यथा क्रतुर्भवति तत्कर्म कुरुते, यत्कर्म कुरुते तदभिसम्पद्यते¹।" ॥ १९ ॥

अविद्याप्रभवं सर्वमसत्तस्मादिदं जगत्। तद्वता दृश्यते यस्मात्सुषुप्ते न च गृह्यते ॥२०॥

अविद्येति—यह सम्पूर्ण जगत् अविद्या से उत्पन्न हुआ है, उस कारण वह मिथ्या है। क्योंकि वह अविद्यावान् पुरुष को ही दिखाई देता है, और सुषुप्ति में उसकी प्रतीति भी नहीं होती ॥ २० ॥

विद्याऽविद्ये श्रुतिप्रोक्ते एकत्वान्यधियो हि नः। तस्मात्सर्वप्रयत्नेन शास्त्रे विद्या विधीयते ॥२१॥

विद्येति—भगवती श्रुति आत्मैक्यज्ञान को ही 'ज्ञान' और भेदज्ञान को ही 'अज्ञान' शब्द से हमें बताती है। अज्ञान (अविद्या) के समान ज्ञान (विद्या) का अनुभव सर्वसाधारण लोगों को नहीं होता है। ज्ञान (विद्या) का प्रतिपादन शास्त्र में ही किया गया है। अतः सर्वथा प्रयत्नपूर्वक शास्त्र के अध्ययन में अपने को तत्पर रखना चाहिये ॥ २१ ॥

हृदयस्पशिनी जगत् की हेतुभूत अविद्या का स्वरूप क्या है? और उसकी निवर्तक विद्या का स्वरूप क्या है? तथा उस विद्या और अविद्या को कौन जानता है? उत्तर यह है कि 'एकत्वधी' विद्या है और 'अन्यधी' अविद्या है। अर्थात् ब्रह्मात्मकत्व बुद्धि को विद्या कहते हैं और उनकी भेदबुद्धि को अविद्या कहते हैं। यही उनका स्वरूप है। विद्या और अविद्या के स्वरूप को श्रुति ने बताया है। "अथ योऽन्यां देवताम्²" इस श्रुति ने भेद-धी (भेदबुद्धि) को अविद्या कहा है। लोकानुभवसिद्ध भेद के अनुवादरूप में यह बताया गया है—"किमु तद्ब्रह्मावेत्³" इस प्रकार आक्षेप कर "ब्रह्म वा इदमग्र आसीत्तदात्मानमेवावेदहं ब्रह्मास्मि⁴" यह अप्रसिद्धार्थबोधक श्रुति प्रमाणभूत है। इसने भी एकत्वज्ञान को ही विद्या बताया है। अज्ञान के समान ज्ञान का सर्वसाधारण को अनुभव नहीं है। इस कारण शास्त्र प्रयत्नपूर्वक अध्यारोप और अपवाद के द्वारा विद्या (ज्ञान) का प्रतिपादन करता है। अतः मुमुक्षु को सर्वदा शास्त्रतत्पर रहना चाहिये ॥ २१ ॥

चित्ते ह्यादर्शवद्यस्माच्छुद्धे विद्या प्रकाशते । यमैर्नित्यैश्च *यज्ञैश्च तपोभिस्तस्य शोधनम् ॥२२॥

चित्त इति—जिस प्रकार दर्पण में मुख आदि का प्रकाश, दर्पण की शुद्धता (निर्मलता) पर निर्भर होता है, उसी प्रकार चित्त की शुद्धता (निर्मलता) रहने पर ही उसमें ज्ञान का प्रकाश होता है, अन्यथा नहीं। अतः यम, नियम, यज्ञ और तप के द्वार चित्त की शुद्धि करनी चाहिये ॥ २२ ॥

१. (बृ. उ. ४।४।७ माध्यंदिन. पाठ.), 'तत्क्रतुर्भवति यत्क्रतुर्भवति' इति काण्व पाठः (बृ. उ. ४।४।५ ) २. (बृ. उ. १।४।१० ) ३. (बृ. उ. १।४।९ ) ४. (बृ. उ. १।४।१० )

  • नियमैस्तपो०—पाठान्तरम् ।