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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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Page 183

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सम्यङ्मतिप्रकरणम् १५७ हृदयस्पर्शिनी यदि शास्त्र अत्यन्त प्रयत्नपूर्वक विद्या को बताता है, तो सभी लोग शास्त्र के प्रति प्रवृत्त क्यों नहीं होते ? तथा प्रवृत्त होने पर भी उन्हें विद्या की प्राप्ति क्यों नहीं होती ? इत्यादि शंकाओं का उत्तर एक ही है कि ‘चित्त की शुद्धि न होने से' प्रवृत्ति नहीं होती और यथाकथंचित् प्रवृत्ति हो भी जाय तो भी विद्या की प्राप्ति नहीं होती । इसलिये चित्तशुद्धि करनी चाहिये । ज्ञान का प्रकाश, दर्पण के समान शुद्ध चित्त में ही पड़ता है । यम, नियम, यज्ञ, और तप के द्वारा चित्त की शुद्धि करनी चाहिये । अहिंसा, ब्रह्मचर्य आदि को ‘यम' कहते हैं । नित्य शौच आदि को ‘नियम' कहते हैं । स्वाश्रमविहित धर्म को 'यज्ञ' कहते हैं। ईश्वर साक्षात्कार कराने वाले साधनों को ‘तप' कहते हैं। इनके अनुष्ठान से चित्त को निर्मल बनाया जा सकता है ॥ २२ ॥ शारीरादितपः कुर्याच्चित्तशुद्ध्यर्थमुत्तमम् । मन आदिसमाधानं तत्तद्देहविशेषणम् ॥२३॥ शारीरादीति—चित्त को निर्मल (शुद्ध) बनाने के लिये शारीरादि ( कायिक-वाचिक-मानसिक ) उत्तम तप करना चाहिये । मन और बाह्येन्द्रियों को निश्चल करना चाहिये । तथा भिन्न-भिन्न ऋतुओं में शीतोष्णादि द्वन्द्वों को सहन करते हुए शरीर को कृश करना चाहिये ॥ २३ ॥ हृदयस्पर्शिनी अन्तःकरण (चित्त-मन) की शुद्धि (निर्मलता) के लिये शास्त्रविहित पद्धति (उत्तम प्रकार) से शारीरिक (कायिक), मानसिक और वाचिक तप करना चाहिये । तथा मन और इन्द्रियों को निश्चल (समाधान = निश्चलता) एवं भिन्न-भिन्न ऋतुओं में शीतोष्णादि को सहन करते हुए शरीर को कृश करना चाहिये । भगवान् ने शारीरिक तप का स्वरूप बताया है—“देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् । ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ॥” उसी प्रकार वाचिक (वाङ्मय) तप का स्वरूप—“अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् । स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥” तथा मानसिक (मानस) तप का स्वरूप- “मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः । भावसंशुद्धिरित्येतत् तपो मानसमुच्यते १ ॥” इति । 'देवता, ब्राह्मण, गुरु और ब्रह्मज्ञानियों की पूजा, बाहर और भीतर की शुद्धि, कर्तव्य कर्म में एवं साधुजनों के विषय में सर्वत्र मन, वचन, और देह के व्यापारों की एकरूपता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा-यह शारीरिक तप कहलाता है ।' 'उद्वेग न करने वाला, सत्य, प्रिय और हितकारक वाक्य और स्वाध्याय का अभ्यास वाङ्मय तप कहलाता है ।' 'मन की प्रसन्नता, सौम्यत्व, ध्यानपरायणता, मन का निग्रह और अन्तःकरण की शुद्धि- यह सब मानस तप कहलाता है ।' इन तीनों तपों का सात्त्विकता के साथ अनुष्ठान करना चाहिये, राजस-तामसरूप में नहीं । सात्त्विक तप का स्वरूप यह है- "श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः । अफलाकांक्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते ।।'—'जिनका एकाग्र चित्त है और जिनकी कर्मफलों में स्पृहा नहीं है, ऐसे पुरुषों द्वारा श्रद्धा से किये गये तीन प्रकार के तप को मुनि लोग सात्त्विक तप कहते हैं ।२' ॥ २३ ॥ “मनसश्चेन्द्रियाणां च ह्यैकाग्र्यं परमं तपः । तज्ज्यायः सर्वधर्मेभ्यः स धर्मः पर उच्यते” ॥२४॥ मनस इति-मनु ने मन और इन्द्रियों की एकाग्रता को 'परम तप' बताया है । उसे समस्त धर्मों की अपेक्षा उत्कृष्ट बताया है और उसी को परम धर्म कहा है ॥ २४ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार आरादुपकारक३ तप को बताकर श्रवण आदि में संनिपत्योपकारक तप के अनुष्ठानार्थ स्मृति- वाक्य को उपस्थित कर रहे हैं- “मनसश्चेन्द्रियाणां च ह्यैकाग्र्यं परमं तपः । तज्ज्यायः सर्वधर्मेभ्यः स धर्मः पर १. ( भ. गी. १७।१४-१७ ) २. ( भ. गी. १७।१७ ) ३. आरादुपकारक और संनिपत्योपकारक—ये पूर्व मीमांसा शास्त्र में अंगों की पारिभाषिक संज्ञाएँ हैं । 'यानि अंगानि साक्षात्