उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर
Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)
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Read in contextसम्यङ्मतिप्रकरणम् १५९. तदेवेकं त्रिधा ज्ञेयं मायाबीजं पुनः क्रमात् । मायाव्यात्माऽविकारोऽपि बहुधैको जलार्कवत् ॥२७॥ तदेवेति — उस एक मायाबीज (अज्ञान) को ही सुषुप्ति आदि अवस्थाओं के क्रम से त्रिविध (तीन प्रकार का) समझना चाहिये। यद्यपि माया (अविद्या) का आश्रयभूत 'आत्मा' तो निर्विकार है, तथापि जल में प्रतिबिम्बित हुए सूर्य के समान वह एक होता हुआ भी अनेक-सा प्रतीत होता है॥ २७॥ हृदयस्पर्शिनी अज्ञान (माया) को अवस्थाओं का बीज कहा गया था, उसी का उपपादन करते हुए बता रहे हैं कि अज्ञान की निवृत्ति से ही सम्पूर्ण संसाररूप उपाधि की निवृत्ति हो जाती है, उसकी निवृत्ति के लिए अन्य कोई यत्न समर्थ नहीं है। यह एक मायाबीज ही जागरित अवस्था में विश्व-वैश्वानररूप से, स्वप्नावस्था में तैजस-हिरण्यगर्भरूप से, सुषुप्त अवस्था में प्राज्ञ-अव्याकृतरूप से त्रिधा होता है। किन्तु वेदान्तवाक्य के श्रवणादि अनुष्ठानक्रम से उत्पन्न ब्रह्मात्मसाक्षात्कार से उस मायाबीज (अज्ञान) की सम्पूर्णतया (अशेषतया) निवृत्ति हो जाती है। तथाच तम (अज्ञान- माया) के दाह से ही स्वप्नादि अवस्थाओं का दाह हो जाता है, उनके दाह के लिए पृथक् प्रयत्न करने की आवश्यकता नहीं होती। क्योंकि ये स्वप्नादि अवस्थाएँ तमोमात्र (तमःस्वरूप) ही तो हैं। अतः तम की निवृत्ति से उनकी निवृत्ति होना उचित ही है। यथोक्त तम स्वयं स्वतन्त्र न होने से उसे आश्रय की अपेक्षा रहती है और कूटस्थ, असङ्ग, अद्वितीय आत्मा को वह अपना आश्रय बनाता है। आत्मा के स्वभाव (स्वरूप) को देखने से उसके साथ तम का संसर्ग न रहने पर भी तम का कोई अन्य आश्रय न होने से उस आत्मा में ही वह आश्रित रहता है। अतः आत्मा कूटस्थ, अद्वितीय रहने पर भी तम के सम्बन्ध के कारण ही तत्तत्पात्रस्थित जल के सम्बन्ध से सूर्य के तुल्य वह सचल, अनेक-सा प्रतीत होता है। तात्पर्य यह है कि ब्रह्म एक ही है, अनेक नहीं है, तथापि अनादि अनिर्वाच्य अज्ञान के सम्बन्ध से वह अन्यथा ही प्रतीत होता है। 'मायावी' कहकर यह सूचित किया है कि वह (आत्मा) मायाशब्दवाच्य अज्ञान का आश्रय है॥ २७॥ बीजं चैकं यथा भिन्नं प्राणस्वप्नादिभिस्तथा । स्वप्नजाग्रच्छरीरेषु तद्वच्चात्मा जलेन्दुवत् ॥२८॥ बीजमिति — जिस प्रकार एक ही कारणरूपा (बीजरूपा) माया अव्याकृत (प्राण), स्वप्न और जाग्रत् आदि अवस्थाओं के रूप में भिन्न-भिन्न हो जाती है, उसी प्रकार जल में प्रतिबिम्बित चन्द्रमा के समान स्वप्न और जाग्रत् आदि शरीरों में एक ही आत्मा समष्टि, व्यष्टि के भेद से तैजस, हिरण्यगर्भ एवं वैश्वानरादि भिन्न-भिन्न रूपों में प्रकाशित होता है ॥२८॥ हृदयस्पर्शिनी श्लोक में 'प्राण' शब्द से अव्याकृत अवस्था बताई गयी है और 'स्वप्नादिभिः' से जाग्रदवस्था, मूर्छावस्था गृहीत की गई है। जिस प्रकार एक ही अविद्या, माया आदि संज्ञाओं से कहा जानेवाला बीज, अर्थात् एक ही कारणरूप माया स्वप्न एवं जाग्रदादि अवस्थाओं के रूप में भेद को प्राप्त हो रही है, वैसे ही जल में प्रतिबिम्बित चन्द्रमा के समान स्वप्न एवं जाग्रदादि शरीरों (मोहकल्पित समष्टि-व्यष्टि स्थूल-सूक्ष्म शरीरों) में एक ही आत्मा (चिदाभास) भिन्न प्रतीत होता है, अर्थात् उस समय उन शरीरों का अधिष्ठानभूत चिदात्मा उपाधिगत आभास की तरह अविवेक के कारण भिन्न-सा प्रतीत होता है। अर्थात् तैजस-हिरण्यगर्भ, एवं विश्व-वैश्वानर आदि भेदरूप से प्रकाशित होता है॥ २८॥ मायाहस्तिनमारुह्य मायाव्येको यथा व्रजेत् । आगच्छंस्तद्वदेवात्मा प्राणस्वप्नादिगोचरः* ॥२९॥
- गौऽचलः—पाठान्तरम् ।