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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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१६० उपदेशसहस्री मायेति—जिस प्रकार कोई मायावी (जादूगर) अपनी माया (जादू) से निर्मित किये हुए हाथी पर सवार होकर किसी दूसरे देश में जाकर पुनः अपने देश में वापस आता है, ऐसा दर्शकों को दिखाई देता है, उसी प्रकार सुषुप्ति एवं स्वप्नादि अवस्थाओं में आत्मा आता-जाता हुआ प्रतीत होता है, तथापि अचल मायावी के समान वह आत्मा अचल (कूटस्थ) ही है—यह समझना चाहिये ॥ २९ ॥ हृदयस्पर्शिनी उस पर शंका होती है कि माया (मोह) कल्पित उपाधियों में आत्मा का बहुत्व (अनेकत्व) यदि लक्षित होता है तो उसमें व्यापार भी (व्यापारवत्त्व भी) लक्षित होगा, तब उसे कूटस्थ कैसे कहा जायगा ? उक्त शंका का समाधान यह है कि जिस प्रकार कोई मायावी (जादूगर) अपने निर्माण किये हुए मायिक हाथी पर आरूढ़ होकर किसी दूसरे देश में जाय और पुनः अपने अभीष्ट देश में आ जाय, इस प्रकार गमनागमन करता हुआ-सा भासित होता रहता है, तथापि वास्तव में वह अचल ही है। उसी प्रकार प्राण (सुषुप्ति) एवं स्वप्नादि अवस्थाओं में आता-जाता हुआ लक्षित होनेपर भी वस्तुतः वह (आत्मा) कूटस्थ ही है ॥ २९ ॥ न हस्ती न तदारूढो मायाव्यन्यो यथा स्थितः । न प्राणादि न तद्द्रष्टा तथा ज्ञोऽन्यः सदादृशिः ॥३०॥ न हस्तीति—जिस प्रकार मायावी की माया से निर्मित हाथी या उस पर सवार हुआ माया से निर्मित पुरुष केवल दिखाई मात्र देता है, वस्तुतः न हाथी है और न उस पर सवार हुआ कोई पुरुष ही है, उन दोनों से भिन्न वह मायावी (जादूगर) ही केवल है। उसी प्रकार अव्याकृतादि (प्राण-स्वप्नादि) अवस्था और उनका साक्षी ये दोनों ही वस्तुतः नहीं हैं, केवल नित्यज्ञानस्वरूप वह आत्मा ही है, जो उनसे भिन्न है ॥ ३० ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्व श्लोक में आत्मा के प्राणादि उपाधिसम्बन्ध को मानकर कहा गया था किन्तु अब वह उपाधिसम्बन्ध भी उसे वस्तुतः नहीं है, यह बता रहे हैं। जिस प्रकार गज (हाथी) या उसपर आरूढ हुआ पुरुष—ये दोनों नहीं हैं, अपितु उससे भिन्न मायावी ही है। उसी प्रकार अव्याकृतादि अवस्था और उनका साक्षी ये दोनों नहीं हैं, अपितु नित्य- ज्ञानस्वरूप कूटस्थ आत्मा, उनसे भिन्न ही है ॥ ३० ॥ अबद्धचक्षुषो नास्ति माया मायाविनोऽपि वा । बद्धाक्षस्यैव सा मायाऽमायाव्येव ततो भवेत् ॥३१॥ अबद्धेति—जादूगर (मायावी) के द्वारा जिस दर्शक की दृष्टि नहीं बाँधी गयी है, उस दर्शक पुरुष की दृष्टि मायावी की माया से प्रभावित नहीं है और मायावी की दृष्टि में भी उसका अभाव है अर्थात् उस जादूगर की बुद्धि में भी उस पुरुष का अस्तित्व ही नहीं है। उसकी माया का प्रभाव तो उन्हीं दर्शकों पर है, जिनकी दृष्टि को उसने अपनी जादू (माया) से बाँध दिया है। अतः आत्मा अमायावी (माया से उपलक्षित उसका आधारमात्र) ही है ॥ ३१ ॥ हृदयस्पर्शिनी वस्तुतः प्राणादि उपाधियों का संबन्ध न रहने पर भी माया का संबन्ध तो अपरिहार्य ही है, ऐसा यदि कोई कहे तो उसका उत्तर यह होगा—जिसके नेत्र बँधे हुए नहीं है, उस (लौकिक) पुरुष की दृष्टि में जिस प्रकार माया नहीं है, उसी प्रकार मायावी की दृष्टि में भी चक्षुर्बन्ध न होने से माया का अभाव ही है, अर्थात् माया नहीं है । 'मायाविनोऽपि' यहां 'अपि' शब्द से यह सूचित किया गया है कि अवस्तुत्व का निश्चय होने से वह मोहित नहीं होता, इस प्रकार व्यतिरेक के द्वारा बताया । अब अन्वय के द्वारा भी बताते हैं—जिसकी आंख बँधी हुई है, उसी के लिये वह माया भयहेतु अर्थात् हाथी आदि के रूप में भासती है। वह माया तो केवल उसी की दृष्टि में है, जिसके नेत्र बँधे हुए हैं। अतः यह आत्मा अमायावी है, अर्थात् माया से उपलक्षित उसका आधारमात्र ही है। माया से अनावृत चित्स्वभाव,