उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर
Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)
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Read in contextसम्यङ्मतिप्रकरणम् १६३ कारण वह अज (विकाररहित) है। और मति (बुद्धि) का मनन करनेवाला एवं उसका विज्ञाता है, क्योंकि वह अलुप्त चिच्छक्ति से युक्त अर्थात् अकुण्ठित चैतन्यशक्ति से युक्त है। इस विषय में “नहि द्रष्टुर्दृष्टेः”१ से आरंभ कर “नहि विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यते”१ यह श्रुति भी है। श्लोक में ‘नहीत्यतः’ यहां पर ‘एतत्’ के अर्थ में ‘अतः’ शब्द है। क्योंकि ‘तसिल्’ प्रत्यय सार्वविभक्तिक माना गया है। कुछ लोग सप्तमी के अर्थ में इसे कहते हैं। दृष्टि के द्रष्टा होने में “न दृष्टेर्द्रष्टारं पश्येर्न श्रुतेः श्रोतारं शृणुया न मतेर्मन्तारं मन्वीथा न विज्ञातेर्विज्ञातारं विजानीयाः। एष त आत्मा सर्वान्तरः”२ यह श्रुति भी है ॥ ३७ ॥ ध्यायतीत्यविकारित्वं तथा लेलायतीत्यपि । अत्र स्तेनेति शुद्धत्वं *तथाऽनन्वागतश्रुतेः ॥३८॥ ध्यायतीति—‘ध्यायतीव लेलायतीव’३—आत्मा मानो ध्यान करता है, वह मानो चेष्टा करता है, इन श्रुति वचनों से आत्मा का अविकारित्व स्पष्ट होता है। तथा इस अवस्था में चोर ‘अचोर’ हो जाता है ‘वह पुण्य से रहित है, पाप से रहित है’—इत्यादि श्रुतियों से उसका शुद्धत्व स्पष्ट प्रतीत होता है ॥ ३८ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा में द्रष्टृत्वादि के व्यपदेश से विकारित्व, अशुद्धत्व की प्रसक्ति होगी, ऐसी शंका करने पर उत्तर देते हैं—श्रुति में ‘इव’ शब्द का प्रयोग करने से ध्यान और चलन में आभासत्व बताया गया है। अर्थात् ‘आत्मा मानो ध्यान करता है’, ‘वह मानो चेष्टा करता है’३ इन श्रुतियों से आत्मा का अविकारित्व सिद्ध होता है। तथा “अत्र स्तेनो- ऽस्तेनो भवति भ्रूणहाऽभ्रूणहा”४—इस अवस्था में चोर, चोरी न करनेवाला हो जाता है, बालघाती भी बालहत्या न करनेवाला हो जाता है, एवं “अनन्वागतं पुण्येनानन्वागतं पापेन”५—वह पुण्य से रहित है, पाप से रहित है—इत्यादि श्रुतियों से उसका शुद्धत्व सिद्ध होता है ॥ ३८ ॥ शक्त्यलोपात्सुषुप्ते ज्ञस्तथा बोधेऽविकारतः । ज्ञेयस्यैव विशेषस्तु यत्र वेति श्रुतेर्वचः ॥३९॥ शक्त्यलोपादिति—सुषुप्ति अवस्था में उसकी शक्ति का लोप न होने से वह (आत्मा) ज्ञान स्वरूप है। विशेष भाव तो केवल ‘ज्ञेय’ में ही है। इसके सम्बन्ध में “जहाँ अन्य-सा होता हैं, वहाँ अन्य ‘अन्य’ को देखता है”—इत्यादि श्रुति वचन प्रमाण है ॥ ३९ ॥ हृदयस्पर्शिनी जबकि सुषुप्ति में ज्ञान का अभाव रहता है और जाग्रत् तथा स्वप्न में ज्ञान का अस्तित्व रहता है, तब आत्मा को अविकारी कैसे कहा जाय ? इस प्रश्न का उत्तर दे रहे हैं— सुषुप्ति अवस्था में शक्ति का लोप न होने के कारण आत्मा ज्ञान(ज्ञ)स्वरूप है६। उसी प्रकार बोध दशा (जाग्रत् और स्वप्न अवस्था) में भी वह ज्ञानस्वरूप है क्योंकि वह निरवयव होने से उसमें विकार अनुपपन्न है। विशेष- भाव तो केवल ज्ञेय में ही है। तीनों अवस्थाओं में यदि आत्मा निर्विशेष चिद्रूप है, तो ‘न अज्ञासिषम्’—मैंने नहीं जाना, यह सुषुप्ति परामर्श कैसे होता है ? और बोध अवस्था में ‘जानामि’—मैं जानता हूँ, यह अनुभव कैसे होता है ? इन १. ( बृ. उ. ४।३।२३-३० ) २. ( बृ. उ. ३।४।२ ) ३. ( बृ. उ. ४।३।७ ) ४. ( बृ. उ. ४।३।२२ ) ५. ( बृ. उ. ४।३।२२ ) ६. ‘यद्वै तन्न पश्यति पश्यन् वै तन्न पश्यति’—( बृ. उ. ४।३।२३-३० )
- गतं श्रुतेः—पाठान्तरम् ।