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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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१६४ उपदेशसाहस्री प्रश्नों का समाधान यह है कि विषय का उपरम और विषय का अनुपरम ही उसमें कारण है। पूर्वोक्त परामर्श और अनुभव दोनों स्वरूपनिबन्धन नहीं हैं। बृहदारण्यक श्रुति ने भी इसका समर्थन किया है१॥ ३९ ॥ व्यवधानाद्धि पारोक्ष्यं लोकदृष्टेर्नात्मनः । दृष्टेरात्मस्वरूपत्वात्प्रत्यक्षं ब्रह्म *तत्स्मृतम् ॥४०॥ व्यवधानादिति- घट-पटादि अनात्म (जड़) पदार्थों को ग्रहण करने वाली चक्षुरादि लौकिक दृष्टि है। वह दृष्टि देश-काल आदि से व्यवहित होने के कारण 'परोक्ष' है। और आत्मस्वरूपभूता ज्ञानदृष्टि अलौकिक है। यह दृष्टि स्वयं आत्मस्वरूपा होने से ब्रह्मज्ञानी विद्वान् 'ब्रह्म' को प्रत्यक्ष बताते हैं। अर्थात् आत्मा और ब्रह्म में अभेद होने से (भेद न रहने से) 'ब्रह्म' सर्वदा ही प्रत्यक्ष है ॥ ४० ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार 'आत्मा नित्य और चैतन्यस्वरूप होने से नित्य अपरोक्ष (प्रत्यक्ष) और निर्विकार है', यह बताया गया है, उसी को विस्तृत रूप से अब आगे तीन श्लोकों में बता रहे हैं-अनात्मरूप घट-पटादि विषय को ग्रहण करने- वाली चक्षुरादि लोकदृष्टि, देश-काल आदि से व्यवहित (सन्निकृष्ट न) होने के कारण परोक्ष है, किन्तु स्वयं दृष्टि आत्मस्वरूपा है। इस कारण आत्मा में दृष्टि का व्यवधान नहीं है। आत्मा तो ब्रह्मरूप ही है। वह ब्रह्म तो स्वतः ही सदा प्रत्यक्ष है, ऐसा ब्रह्मज्ञ लोग कहते हैं। अभिप्राय यह है-लौकिक और अलौकिक दो प्रकार की दृष्टि होती है। चक्षुरादि इन्द्रियों से होनेवाली दृष्टि (ज्ञान) लौकिक है, और आत्मस्वरूपभूता ज्ञानदृष्टि अलौकिक है। चक्षुरादि इन्द्रिय से उसके विषय कहलानेवाले घट-पटादि में देश-काल आदि का व्यवधान रहता है, इसलिये वह परोक्ष दृष्टि है, किन्तु आत्मा और ब्रह्म में अभेद रहने से ब्रह्म सर्वदा प्रत्यक्ष है। वह दृष्टि भी आत्मस्वरूपा है। अतः उसे परोक्ष नहीं कहा जाता ॥ ४० ॥ न हि दीपान्तरापेक्षा यद्वद्दीपप्रकाशने । बोधस्यात्मस्वरूपत्वान्न बोधोऽन्यस्तथेष्यते ॥४१॥ नहीति-जैसे दीपक को प्रकाशित करने के लिये अन्य दीपक की अपेक्षा नहीं होती, वैसे ही 'बोध' आत्म- स्वरूप होने के कारण उसे भी अपने प्रकाश के लिये किसी अन्य बोध की अपेक्षा नहीं होती है ॥ ४१ ॥ हृदयस्पर्शिनी स्वरूपप्रकाश अनन्यपेक्ष होता है, इसे दृष्टान्त के द्वारा स्पष्ट कर रहे हैं-जिस प्रकार किसी दीपक को प्रकाशित करने के लिये किसी दूसरे दीपक की आवश्यकता (अपेक्षा) नहीं रहती, उसी प्रकार बोध (ज्ञान) आत्म- स्वरूप होने के कारण उसे भी अपने को प्रकाशित करने में किसी दूसरे बोध (ज्ञान) की अपेक्षा नहीं होती ॥ ४१ ॥ विषयत्वं विकारित्वं नानात्वं वा न हीष्यते । न हेयो नाप्युपादेय आत्मा नान्येन वा ततः ॥४२॥ विषयत्वमिति-इस प्रकार आत्मा (ज्ञान) को अपरोक्षता को स्पष्ट करके उसके अविकारित्व और निर्वि- शेषता को बता रहे हैं- आत्मा का विषयत्व, विकारित्व और नानात्व का भी स्वीकार नहीं किया जा सकता । इस कारण आत्मा अपने अथवा किसी अन्य के द्वारा ग्राह्य या त्याज्य भी नहीं है ॥ ४२ ॥ सबाह्याभ्यन्तरोऽजीर्णो जन्ममृत्युजरातिगः । अहमात्मेति यो वेत्ति कुतो न्वेव बिभेति सः ॥४३॥ १. 'यत्र वा अन्यदिव स्यात्तत्रान्योऽन्यत्पश्येत्' - (बृ. उ. ४।३।२१) तथा 'यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत् तत्केन कं पश्येत्'- (बृ. उ. ४।५।१५)

  • यत्स्मृतम्-पाठान्तरम् ।