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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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सम्यङ्मतिप्रकरणम् १६५ स बाह्य ति—जो यह जान लेता है कि 'मैं बाहर, भीतर विद्यमान हूँ, मैं जीर्ण-शीर्ण नहीं हूँ, मैं जन्म-मृत्यु तथा वार्धक्य से रहित हूँ, ऐसा मैं ही आत्मा हूँ', तब वह किसी से क्यों डर सकता है ? ॥४३॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा की निर्विकारता कैसे हो सकती है ? क्योंकि नरकपात आदि का भय होने से उसकी निवृत्ति के लिये धर्मानुष्ठान बताया गया है। पदार्थ के सम्यक् शोधन के द्वारा जो आत्मतत्त्व को जानता है, वह किससे भयभीत हो सकता है ? क्योंकि भय के हेतुभूत द्वितीय तो बाधित है । अर्थात् अज्ञानावस्था में ही भीति और तन्निवृत्त्यर्थ धर्मानुष्ठान होता है। ज्ञानावस्था में न भय है और न तन्निवृत्त्यर्थ धर्मानुष्ठान है। मैं बाहर-भीतर विद्यमान, प्राचीनता से रहित और जन्म, मृत्यु, जरा से शून्य आत्मा हूँ, ऐसा जो जानता है, उसे किसी से भय नहीं होता ॥ ४३ ॥ प्रागेवैतद्विधेः कर्म वर्णित्वादेरपोहनात् । तदस्थूलादिशास्त्रेभ्यस्तत्त्वमेवेति निश्चयात् ॥४४॥ प्रागेवेति—'आत्मा अस्थूल है, अनणु है, इस श्रुति के द्वारा कर्माधिकार की प्राप्ति में कारणभूत वर्णित्वादि का निराकरण (बाध) किया गया है, उस कारण और 'तत् त्वमसि' तुम वह (ब्रह्म) हो, इस महावाक्य के द्वारा अपने ब्रह्मत्व का निश्चय होने से पूर्व ही 'यावज्जीवन अग्निहोत्र करे'—इस श्रुतिवचन से बताया गया कर्मानुष्ठान आवश्यक है ॥ ४४ ॥ हृदयस्पर्शिनी ज्ञानी के लिये भी वेदविहित अग्निहोत्रादि कर्मों का अनुष्ठान यावज्जीवन करने के लिये कहा गया है, और उसके न करनेपर प्रत्यवाय का भय ज्ञानी (विद्वान्) के लिये भी है, तत्परिहारार्थ ज्ञानी को भी अनुष्ठान करना ही होगा, इस आशंका का समाधान इस प्रकार होगा—ब्रह्मात्मरूप के प्रतिपादन के पूर्व ही अग्निहोत्रादि कर्म बताये गये हैं, उसके बाद नहीं, क्योंकि ब्रह्मात्मज्ञान से तो कर्मानुष्ठान के प्रयोजक वर्णित्व, आश्रमित्व आदि के अभिमान का बाध हो जाता है। यदि कहें कि वर्णाश्रमादि से युक्त अधिकारी को कर्मानुष्ठान का त्याग करना उचित नहीं है, किन्तु उसका समाधान यह है कि अस्थूलादि लक्षण वह ब्रह्म तू ही है, इस प्रकार 'तत्त्वमसि' आदि वाक्य से निश्चय होने के कारण कर्मानुष्ठान के अधिकारी को 'अहं ब्रह्म' मैं ब्रह्म हूँ—इस प्रकार बोध (ज्ञान) हो जाने पर उसके लिये कर्मानुष्ठान नहीं है। क्योंकि कर्माधिकार की प्राप्ति में कारण तो वर्णाश्रमित्व है, उसका अस्थूलादि शास्त्र से अपोहन (बाध) हो जाता है। तब वह कर्मानुष्ठान का अधिकारी ही नहीं रहता। अतः जिसका जो अनधिकारी है, उसे उसके न करनेपर प्रत्यवाय का होना संभव ही नहीं है। एवं च ब्रह्मज्ञानी के लिये कर्मानुष्ठान प्राप्त ही नहीं है ॥ ४४ ॥ पूर्वदेहपरित्यागे जात्यादीनां प्रहाणतः । देहस्यैव तु जात्यादिस्तस्याप्येवं ह्यनात्मता ॥४५॥ पूर्वदेहेति—देह का त्याग होनेपर उसकी जाति आदि का भी त्याग हो जाता है। अतः ये जाति आदि देह के ही धर्म हैं। वे आत्मा के धर्म नहीं हैं, क्योंकि ये आगमापायी हैं। उसी तरह देह भी आगमापायी होने से वह भी अनात्मा है ॥ ४५ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा में वर्णाश्रमित्वादि की प्रतीति अध्यास के बल पर होती है। देह का परित्याग करने पर तत्सम्बद्ध जाति का भी परित्याग होता है। अतः जाति आदि आगमापायी हैं, इस कारण उन्हें आत्मा के धर्म नहीं कह सकते; वे जाति आदि तो देह के ही धर्म हैं। यदि देह को ही आत्मा कहें तो वह भी उचित नहीं है, क्योंकि देह भी आगमापायी होने से उसे भी आत्मा नहीं मान सकते। एवं च देह भी अनात्मस्वरूप ही है। देह को जो कर्माधिकार प्राप्त होता है, वह भी वर्णाश्रम के अनुरोध से ही है। अतः आत्मा में कर्माधिकार के हेतुभूत वर्णाश्रम के न होने से उसे स्वभावतः ही कर्मकर्तृत्व नहीं है ॥ ४५ ॥