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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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१६६ उपदेशसाहस्री ममाहं चेत्यतोऽविद्या शरीरादिष्वनात्मसु । आत्मज्ञानेन हेया स्यादसुराणामिति श्रुतेः ॥४६॥ ममाहमिति—अतः शरीरादि अनात्म पदार्थों में जो ममता और अहंता होती रहती है, उसी को अविद्या कहते हैं। उसका आत्मज्ञान के द्वारा (आत्मतत्त्वब्रह्मात्मानुसन्धान के द्वारा) बाध (नाश) करना चाहिये। इस प्रकार की देहात्मदृष्टि को आसुरी सम्पत्ति कहा है, उसकी निन्दा भगवती श्रुति ने की है ॥ ४६ ॥ हृदयस्पर्शिनी शरीरादि में आत्मा-आत्मीय होने का अभिमान तो सर्वत्र प्रसिद्ध ही है, उसे हेय (त्याज्य) कैसे कहा जाय ? इस आशंका का समाधान यह है कि देह के आगमापायी रहने से उसका अनात्मत्व तो निश्चित ही है। उस कारण शरीरादि अनात्माओं में जो ममता और अहंता का अभिमान है, वह मिथ्या प्रत्यय है, अर्थात् उसी का नाम अविद्या है, उसका आत्मतत्त्वब्रह्मात्मानुसन्धान (आत्मज्ञान) के द्वारा बाध करना चाहिये। देहात्मदृष्टि (ज्ञान) को आसुर ज्ञान कहा गया है, इसी कारण श्रुति ने उसकी निन्दा की है। इस ज्ञान को असुरों की उपनिषद् कहा गया है¹। अतः देहात्मदर्शन को हेय समझना चाहिये ॥ ४६ ॥ दशाहाशौचकार्याणां पारिव्राज्ये निवर्तनम् । यथा ज्ञानस्य संप्राप्तौ तद्वज्जात्यादिकर्मणाम् ॥४७॥ दशाहेति—शास्त्रविधि के अनुसार संन्यास (पारिव्राज्य) ग्रहण करनेपर सपिण्डता का अभिमान नष्ट हो जाने से किसी सपिण्ड की अथवा उसीकी मृत्यु होने के कारण जो दशाह (दस दिन) के अशौचादि कार्य होते हैं, वे किसी को अथवा उस संन्यासी को नहीं करने पड़ते। उसी प्रकार आत्मज्ञान के होनेपर जाति आदि का अभिमान नष्ट हो जाने के कारण उस ज्ञानी पुरुष को कर्मानुष्ठान नहीं करना पड़ता ॥ ४७ ॥ हृदयस्पर्शिनी तत्त्वज्ञान के पश्चात् कोई कर्मानुष्ठान नहीं और न ही तत्प्रयोजक जाति आदि का सम्बन्ध आत्मा से है, इसे दृष्टान्त देकर समझाते हैं—जिस प्रकार संन्यासाश्रम ग्रहण करने पर सपिण्डताभिमान के न होने से संन्यासी को अशौचादि प्राप्त नहीं होते, उसी प्रकार ब्रह्मात्मज्ञान की प्राप्ति होने पर जात्यादि का अभिमान न रहने से विद्वान् को कर्मानुष्ठान की आवश्यकता नहीं रहती ॥ ४७ ॥ यत्कामस्तत्क्रतुर्भूत्वा कृतं त्वज्ञः प्रपद्यते । यदा स्वात्मदृशः कामाः प्रमुच्यन्तेऽमृतस्तदा ॥४८॥ यत्कामइति—अज्ञानी पुरुष अपनी कामना (फल की इच्छा) के अनुसार ही सङ्कल्प करता है, तदनुरोधेन ही कर्म करके फल प्राप्त करता है, किन्तु जिस समय आत्मज्ञानी की समस्त कामनाएँ समाप्त हो जाती हैं, उस समय वह अमर अर्थात् संसारबन्धन से मुक्त हो जाता है ॥ ४८ ॥ हृदयस्पर्शिनी जब कि ब्रह्मात्मता के अज्ञान के कारण आत्मा के लिये यह संसार देहाध्यासनिबन्धक रहता है, उस कारण तत्त्वज्ञान होने से पूर्व कामादि से युक्त हुआ वह आत्मा धर्माधर्म के कारण संसरण करता रहता है, किन्तु ब्रह्मात्मज्ञान होने पर कामादि का अभाव हो जाने से वह मुक्त हो जाता है। अज्ञानी पुरुष तो जैसी कामना करता है, उसी प्रकार १. 'असुराणां ह्येषोपनिषद्'—(छां उ. ८।८।५)