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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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सम्यङ्मतिप्रकरणम् १६७ के संकल्प से युक्त होकर उसका फल पाता है। किन्तु जिस समय आत्मज्ञानी की समस्त कामनाएँ निवृत्त हो जाती हैं, उस समय वह अमर (अमृत) हो जाता है। अर्थात् संसारबन्धन से मुक्त हो जाता है१ ॥ ४८ ॥ आत्मरूपविधेः कार्यं क्रियादिभ्यो निवर्तनम् । न साध्यं साधनं वाऽऽत्मा नित्यतृप्तः* स्मृतेर्मतः ॥४९॥ आत्मरूपेति—आत्मा के स्वरूपप्रतिपादन का प्रयोजन—कर्म आदि से निवृत्त हो जाना ही है। ‘आत्मा’ न साध्य है और न साधन ही है। वह तो नित्यतृप्त है, ऐसा स्मृति ने कहा है ॥ ४९ ॥ हृदयस्पर्शनी काम्य कर्म की निवृत्ति से मोक्ष होने पर भी उस काम्य कर्म की निवृत्ति ही कैसे हो सकेगी ? इस आशंका के होने पर कहते हैं कि यद्यपि क्रिया-कारक फल आदि से निवृत्त होना आत्मतत्त्वावबोध के द्वारा सम्पन्न होता है अर्थात् कर्मादि से निवृत्त होना ही आत्मस्वरूप ज्ञान का फल है, तथापि उसका अन्तर्भाव, साध्य-साधन में से किसी एक में होने के कारण क्रियासंस्पर्शित्व तो बना ही रहेगा—यह शंका हो सकती है, किन्तु वह ठीक नहीं है। क्योंकि 'एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति'२, 'नित्यतृप्तो निराश्रयः३' इत्यादि श्रौत-स्मार्त प्रमाणों से आत्मा की नित्यतृप्तता का बोध होता है। वह तो साध्य-साधन से विलक्षण है, अतः उसमें स्वभावतः क्रियादि का संस्पर्श नहीं है, उसमें जो स्पर्शादि प्रतीति होती है, वह अध्यासमूलक है, ऐसा निश्चय कर आत्मतत्त्वज्ञान के द्वारा ही क्रिया आदि का त्याग करना चाहिये ॥ ४९ ॥ उत्पाद्याप्यविकार्याणि संस्कार्यं च क्रियाफलम् । नातोऽन्यत्कर्मणा कार्यं त्यजेत्तस्मात्ससाधनम् ॥५०॥ उत्पाद्येति—क्रिया (कर्म) का फल 'उत्पाद्य', 'आप्य', विकार्य' और 'संस्कार्य' के भेद से चार प्रकार का होता है। मुमुक्षु पुरुष को कर्म से कोई प्रयोजन नहीं है। अतः उसे चाहिये कि वह साधनसहित कर्म का त्याग करे ॥ ५० ॥ हृदयस्पर्शनी आत्मस्वरूपावस्थानलक्षण मोक्ष तो चतुर्विधा क्रिया और उसके फल से विलक्षण है। कर्म का फल उत्पाद्य, आप्य, विकार्य और संस्कार्य चार प्रकार का होता है। 'जैसे जुलाहा वस्त्र बनाता है', यहाँ 'बनाना' क्रिया का कर्मरूप वस्त्र 'उत्पाद्य' है, 'देवदत्त भात पकाता है', यहाँ 'पकाना' क्रिया का कर्मरूप भात 'विकार्य' है, 'रघुनाथ घर जाता है' यहाँ 'जाना' क्रिया का कर्मरूप घर 'आप्य' है, और 'यज्ञदत्त दर्पण स्वच्छ करता है', यहाँ 'स्वच्छ करना' क्रिया का कर्मरूप दर्पण 'संस्कार्य' है। किन्तु आत्मा में ऐसा कोई गुण नहीं है। अतः वह किसी क्रिया का कर्म नहीं कहा जाता । अतः मुमुक्षु को मोक्ष के लिये किसी क्रियानुष्ठान की कोई आवश्यकता नहीं, क्योंकि मोक्ष तो क्रिया और फल से विलक्षण है। अतः उसमें क्रिया का संभव नहीं है। इसलिये साधनसहित अर्थात् जाया, अपत्य, वित्त, शिखा यज्ञोपवीतादि साधनसहित विधिरूप कर्म का त्याग कर देना चाहिये। क्योंकि कृतक अनित्य होता है। और मोक्ष तो नित्य आत्मस्वरूप में अवस्थितिरूप है। अतः मुमुक्षु को कर्म से कोई प्रयोजन नहीं है ॥ ५० ॥ तापान्तत्त्वादनित्यत्वादात्मार्थत्वाच्च या बहिः । संहृत्याऽऽत्मनि तां प्रीतिं सत्यार्थी गुहामाश्रयेत् ॥५१॥ १. 'यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः । अथ मर्त्योऽमृतो भवति............................ ॥ (बृ. उ. ४।४।७) २. (बृ. उ. ४।३।३२ ) ३. (भ. गी. ४।२० )

  • तृप्तश्रुते—पाठान्तरम् ।