BharatKosha
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

Page 199 of 364

Read in context
Page 199

सम्यङ्मतिप्रकरणम् १७३ नामादिभ्यः परे भूम्नि स्वाराज्ये चेत्स्थितोऽद्वये । प्रणमेत्कं तदाऽऽत्मज्ञो न कार्यं कर्मणा *तथा ॥६४॥ नामेति—वह ब्रह्मात्मैक्यज्ञानसम्पन्नपुरुष यदि नाम आदि से अतीत, व्यापक, अद्वितीय स्वाराज्य में स्थित हो गया है तो वह किसे प्रणाम करेगा ? उस समय तो उस पुरुष को कर्म से कोई प्रयोजन ही नहीं होता ॥ ६४ ॥ हृदयस्पर्शिनी हरि, हर, हिरण्यगर्भ आदि बड़े-बड़े देवता, विद्वान् ब्रह्मज्ञानी के लिये भी प्रणम्य होते हैं। उनके अति- क्रमण का भय संभव रहने से उस ब्रह्मवित् के लिये कार्यशेष तो मानना ही होगा ? —ऐसा यदि कोई कहे तो उसपर कह रहे हैं कि ब्रह्मवित् यदि नामादि से अतीत, व्यापक, अद्वितीय स्वाराज्य में स्थित है तो वह किसको प्रणाम करेगा ? उस समय तो उसको कर्म से कोई प्रयोजन ही नहीं रहता; क्योंकि परिपक्वज्ञान होने से वह कृतकृत्य रहता है, अतः उसे किसी भी कर्म से कोई प्रयोजन नहीं होता । दूसरे के प्रति महद्भाव और अपने प्रति गौणीभाव रहने पर ही प्रणाम किया जाता है, किन्तु आत्मज्ञ विद्वान् तो प्रणम्यों का भी आत्मरूप है, जब सर्वत्र वही है, तो कौन छोटा और कौन बड़ा रहा ? सभी स्वस्वरूप हैं, अतः किसे प्रणाम करना होगा ? ॥ ६४ ॥ विराड्वैश्वानरो बाह्यः स्मरन्नन्तः प्रजापतिः । प्रविलीने तु सर्वस्मिन् प्राज्ञोऽव्याकृतमुच्यते ॥६५॥ विराडिति—वही आत्मा जाग्रदवस्था में बहिष्प्रज्ञ होने पर व्यष्टि और समष्टि के भेद से 'विराट्' और 'वैश्वानर', तथा स्वप्नावस्था में अन्तःकरण में स्मरण करने पर 'तैजस' और 'हिरण्यगर्भ', और सुषुप्तावस्था में सभी के लीन हो जाने पर 'प्राज्ञ' और 'अव्याकृत' कहलाता है ॥ ६५ ॥ हृदयस्पर्शिनी यह भूमा (ब्रह्म), नाम, वाक्, मन आदि से लेकर प्राण तक जितने भी हैं, उन सबके परे है, यह कहा गया है¹। ऐसी स्थिति में उस ब्रह्म को अद्वय कैसे कहें ? ये नाम आदि अवस्थात्रयरूप होने से अध्यस्त हैं, अतः मिथ्या हैं। उनका साक्षी तुरीय भूमा (ब्रह्म) तो अद्वय है, उसे बताने के लिए तीन अवस्थाओं को बताते हैं—वह आत्मतत्त्व ही जाग्रदवस्था में बहिष्प्रज्ञ होने पर व्यष्टि-समष्टि भेद से विराट् और वैश्वानर, स्वप्नावस्था में अन्तःकरण में स्मरण करने पर तैजस और हिरण्यगर्भ, तथा सुषुप्तावस्था में सबके लीन हो जाने पर प्राज्ञ और अव्याकृत कहा जाता है। अध्यात्म और अधिदैवत के अभेदाभिप्राय से विराट्-वैश्वानर अर्थात् विश्व-वैश्वानर कहा। बाह्य का अर्थ बहिःप्रज्ञ है। 'अन्तः स्मरन्' कहकर यह बताया है कि स्वप्न में वासनामय विषयों को देखनेवाला प्रजापति हिरण्यगर्भ तैजस है। अव्याकृत माया की उपाधि से युक्त ईश्वरतत्त्व को 'प्राज्ञ' कहा गया है ॥ ६५ ॥ वाचारम्भणमात्रत्वात्सुषुप्तादित्रिकं त्वसत् । सत्यो ज्ञश्चाहमित्येवं सत्यसन्धो विमुच्यते ॥६६॥ वाचारम्भणेति—सुषुप्तादि तीनों अवस्थाएँ तो मिथ्या हैं, क्योंकि ये वाचारम्भण मात्र हैं। 'मैं (आत्मा) ही ज्ञानस्वरूप हूँ'—यह जाननेवाला सत्यसन्ध मुमुक्षु पुरुष मुक्त हो जाता है ॥ ६६ ॥ हृदयस्पर्शिनी अवस्थात्रयात्मक जगत् को मिथ्या समझकर उसकी साक्षीभूत वस्तु जो ब्रह्म है, वह मैं हूँ, यह ज्ञान होनेपर मुक्त हो जाता है। वाणी से आरंभ होने के कारण सुषुप्ति आदि तीनों अवस्थाएँ मिथ्या हैं', 'मैं ज्ञानस्वरूप आत्मा ही सत्य हूँ' इस प्रकार का ज्ञान होनेपर सत्यप्रतिज्ञ पुरुष मुक्त हो जाता है ॥ ६६ ॥ १. ( के. उ. १।१-८ )

  • तदा—पाठान्तरम् ।