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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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यहाँ पृष्ठ का पूर्ण देवनागरी पाठ प्रस्तुत है:

१७४ उपदेशसाहस्री भारूपत्वाद्यथा भानोर्नाहोरात्रे तथैव *च । ज्ञानाज्ञाने न मे स्यातां चिद्रूपत्वाविशेषतः ॥६७॥ भारूपत्वादिति—जिस प्रकार सूर्य में दिन तथा रात्रि नहीं होती है, क्योंकि वह प्रकाशरूप है, इसी प्रकार चिद्रूपत्त्व की समानता होने से मुझ (आत्मा) में न ज्ञान है और न अज्ञान ही है ॥ ६७ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मतत्त्व का ज्ञान न होने से अध्यस्त रहनेवाले संसार की निवृत्ति अधिष्ठानरूप आत्मतत्त्व के ज्ञान से हो जाती है। यह कहने से ज्ञान और अज्ञान को आत्मधर्म कहना होगा ?—इस आशंका का समाधान दृष्टान्त देकर कर रहे हैं—जिस प्रकार प्रकाशस्वरूप होने के कारण सूर्य में दिन-रात का अभाव रहता है, उसी प्रकार चिद्रूपता की समानता होने से मुझ आत्मा में न ज्ञान है, न अज्ञान है। मैं तो ज्ञान-अज्ञान दोनों का ही साक्षी हूँ, और वे दोनों मेरे साक्ष्य हैं, अतः वे दोनों कल्पित हैं। कल्पित होने के कारण वे दोनों मेरे धर्म नहीं हैं ॥ ६७ ॥ शास्त्रस्यानतिशङ्क्यत्वादब्रह्मैव स्यामहं सदा । ब्रह्मणो मे न हेयं स्याद्ग्राह्यं वेति च संस्मरेत् ॥६८॥ शास्त्रस्येति—शास्त्र का प्रामाण्य किसी प्रकार भी शङ्का करने के योग्य न होने से 'मैं सर्वदा ब्रह्मरूप ही हूँ' । अतः मुझ ब्रह्मस्वरूप के लिये 'न कुछ हेय (त्याज्य) है और न कुछ उपादेय (ग्राह्य) है'—यह सर्वदा स्मरण रखना चाहिये ॥ ६८ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा की निर्विशेषता शास्त्रप्रामाण्य से ही सिद्ध हैं, अतः कुतर्क से मन को दूषित नहीं करना चाहिए। शास्त्र का प्रामाण्य किसी प्रकार से भी शंका करने योग्य नहीं है, उसका प्रामाण्य निःशङ्क है । अतः 'मैं सर्वदा ब्रह्म ही हूँ, ब्रह्मरूप हुए मेरे लिये न कुछ हेय है और न ग्राह्य है', यह सर्वदा स्मरण रखना चाहिए ॥ ६८ ॥ अहमेव च भूतेषु सर्वेष्वेको नभो यथा । मयि सर्वाणि भूतानि पश्यन्नेवं न जायते ॥६९॥ अह्ममिति—जैसे आकाश सर्वत्र विद्यमान है, वैसे मैं ही समस्त भूतों में विद्यमान हूँ तथा समस्त भूत मुझमें विद्यमान हैं, ऐसी दृष्टि रखने वाला पुरुष पुनः कभी उत्पन्न नहीं होता अर्थात् जन्म ग्रहण नहीं करता ॥ ६९ ॥ हृदयस्पर्शिनी वह ब्रह्मपरक शास्त्र कौन-सा है, और सर्वदा अहेय अनुपादेय ब्रह्मात्मज्ञाननिष्ठा का फल क्या है ? ऐसी अपेक्षा होनेपर 'यस्तु सर्वाणि भूतानि'१ इत्यादि मन्त्रार्थ को दे रहे हैं—मैं एकाकी ही आकाश के समान यच्चयावत् सम्पूर्ण भूतमात्र में विद्यमान हूँ, तथा सम्पूर्ण भूतमात्र मुझमें स्थित हैं। इस प्रकार की दृष्टि (ज्ञान) होनेपर उस ज्ञानी को जन्म नहीं लेना पड़ता ॥ ६९ ॥ न बाह्यं मध्यतो वाऽन्तर्विद्यतेऽन्यत्स्वतः क्वचित् । सबाह्यान्तःश्रुतेः किञ्चित्तस्माच्छुद्धः स्वयंप्रभः ॥७०॥ न बाह्यमिति—बाहर, भीतर या मध्य में आत्मा के अतिरिक्त अन्य कोई वस्तु नहीं है। इस तथ्य को भगवती श्रुति ने बताया है। इसलिये वह आत्मा शुद्ध और स्वयम्प्रकाश है ॥ ७० ॥ १. (ई. उ. ६)

  • तु—पाठान्तरम् ।
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