उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर
Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)
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Read in context१७६ | उपदेशसाहस्री हूँ' इस प्रकार यदि परब्रह्म का ज्ञान हो जाय तो वह समस्त प्राणिमात्र का आत्मा हो जाता है। वह विद्वान् ब्रह्म- ज्ञानी देवताओं का भी आत्मा होने से उस विघ्नप्रतिपादक श्रुति को अविद्वद्विषयक समझना चाहिये । "तस्य ह न देवाश्च ना भूत्या ईशते । आत्मा ह्येषां स भवति१"-उसके पराभव में देवता भी समर्थ नहीं होते, क्योंकि वह उनका आत्मा ही हो जाता है, यह बृहदारण्यक श्रुति बता रही है ॥ ७२ ॥ जीवश्चेत्परमात्मानं स्वात्मानं देवमञ्जसा । देवो [वेदो] पास्यः स देवानां पशुत्वाच्च निवर्तते ॥७३॥ जीवश्चेदिति-यदि जीव अपने को परमात्मस्वरूप जानने लगता है, तो वह शीघ्र ही देवताओं का भी उपास्य हो जाता है और देवताओं के पशुत्व से निवृत्त होता है ॥ ७३ ॥ हृदयस्पर्शिनी उक्त साधनसम्पन्न ब्रह्मात्मज्ञानवान् विद्वान् अपनी जीवित अवस्था में ही देवताओं का भी उपास्य बन जाता है, अतः उसके प्रति देवपशुत्व की शंका भी नहीं की जा सकती अर्थात् देवताओं के पशुत्व से वह निवृत्त हो जाता है। अतः उसे किसी से भी भय नहीं रहता । इसी अभिप्राय को श्रुति ने भी बताया है— "यदैव मनु पश्यत्यात्मानं देवमञ्जसा । ईशानं भूतभव्यस्य न तदा विजुगुप्सते२ ॥" तथा तैत्तिरीय उपनिषद् ने भी बताया है कि "सर्वैस्मै देवा बलिमावहन्ति३" उसी प्रकार तैत्तिरीय आरण्यक ने भी कहा है कि "तमेवं विद्वानमृत इह भवति४" ॥ ७३ ॥ अहमेव सदात्मज्ञः शून्यस्त्वन्यैरथाम्बरम् । इत्येवं सत्यसन्धत्वादसद्धाता* न बध्यते ॥७४॥ अह्मिति—'मैं ही सत्स्वरूप चेतन आत्मा हूँ, तथा आकाश के समान अन्य पदार्थों से रहित हूँ'-इस प्रकार सत्यसन्ध होने के कारण असत्य का त्याग करने वाला पुरुष, चोर के समान बद्ध नहीं होता है ॥ ७४ ॥ हृदयस्पर्शिनी यह जो पीछे कहा था कि "सत्यसन्धो विमुच्यते" उसी को स्पष्ट कर रहे हैं-मैं ही 'सत्' स्वरूप चेतन आत्मा हूँ, और आकाश के तुल्य अन्य पदार्थों से रहित हूँ। इस प्रकार सत्यसन्ध होने के कारण असत्य का त्याग करने वाला पुरुष, चोर के समान बन्धन को प्राप्त नहीं होता, या उसका वध नहीं किया जाता । 'सदात्मज्ञः' में कर्मधारय समास 'सदात्मा चासौ ज्ञश्च-सदात्मज्ञः' करना चाहिये । इसका उदाहरण 'तत्सत्यं स आत्मा५' यह श्रुति है। 'अन्यैः शून्यः' कहकर वाचारंभण श्रुति के अर्थ को बताया है। 'यथाम्बरम्' से दृश्यसंसर्गशून्य होने के कारण शुद्ध रहने में दृष्टान्त बताया है। 'असद्धाता' से अनृताभिसन्धि से रहित होने के कारण अतस्कर के समान बन्धनार्थहीन रहता है। इसके उदाहरण में “स यथा तत्र न दह्ये तैतदात्म्यमिदं सर्वम्६” यह श्रुति है। अथवा 'असत: हाता'—असद्धाता अर्थात् कार्यसहित अज्ञान का नाशयिता अर्थ करना चाहिये ॥ ७४ ॥ कृपणास्तेऽन्यथैवातो विदुर्ब्रह्म परं हि ये । स्वराड्चोऽनन्यदृक् स्वस्थस्तस्य देवा असन्वशे ॥७५॥ १. ( बृ. उ. १।४।१० ) २. ( कठ. उ. ४।६ ) ३. ( तै. उ. १।५ ) ४. ( तै. आ. ३।१।३ ) ५. ( छा. उ. ६।८।७ ) ६. ( छा. उ. ६।१६।३ )
- ह्तानाज्ञ-पाठान्तरम् ।