उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर
Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)
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Read in contextसम्यङ्मतिप्रकरणम् १७७
कृपणा इति—वे लोग कृपण (दीन) हैं, जो 'आत्मा' को 'ब्रह्म' से भिन्न समझते हैं, परन्तु जो लोग 'ब्रह्म' और 'आत्मा' दोनों में अभेद देखते हैं, वे स्वयंप्रकाश और आत्मनिष्ठ कहलाते हैं। सम्पूर्ण देवतागण भी उसके वशंगत रहते हैं ।। ७५ ।। हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार का ज्ञान न होने से अन्य प्राकृत लोग शोच्य रहते हैं, इसे दिखाते हुए "अथ येऽन्यथाऽतो विदुरन्यराजानस्ते क्षय्यलोका भवन्ति१” इस श्रुति के अर्थ को बता रहे हैं—जो लोग परब्रह्म को आत्मा से भिन्न अर्थात् अनात्मरूप जानते हैं, वे कृपण यानी दीन (शोच्य) ही हैं। किन्तु जो अभेददर्शी है, वह कृपण नहीं है। वह स्वयंप्रकाश और आत्मनिष्ठ रहता है, सम्पूर्ण देवगण उसके अधीन रहते हैं। छान्दोग्य श्रुति बता रही है— 'एवं विजानन्नात्मरतिरात्मक्रीड आत्ममिथुन आत्मानन्दः स स्वराड् भवति२' तथा “तस्य सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति"—इस प्रकार विशेषरूप से जानने वाला आत्मरत, आत्मक्रीड़, आत्ममिथुन और आत्मानन्द होता है, वह स्वराट् है, सम्पूर्ण लोकों में उसकी यथेच्छ गति होती है। 'आसम्' अर्थ में 'असन्' प्रयोग छान्दस है। "यस्त्वेवं ब्राह्मणो विद्यात् । तस्य देवा असन् वशे" इस तैत्तिरीय आरण्यक के मन्त्र में 'असन्' प्रयोग हुआ है। जो इस प्रकार का ब्रह्मनिष्ठ ब्राह्मण 'वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम् ३' के अनुसार ब्रह्मात्मा को जानता है, देवता उस ब्रह्मनिष्ठ के वशवर्ती हो जाते हैं ।। ७५ ।। हित्वा जात्यादिसम्बन्धा *न्वाचोऽन्याः सह कर्मभिः । ओमित्येवं †स्वमात्मानं सर्वं शुद्धं प्रपद्यथ ॥७६॥ हित्वेति—जाति आदि सम्बन्धों का तथा कर्मकलाप के सहित अन्य समस्त वाक्यों का त्याग करके सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का आधारभूत 'ॐ' शब्द से वाच्य जो शुद्ध आत्मा है, उसी के शरण में जाओ ।। ७६ ।। हृदयस्पर्शिनी यथोक्त आत्मज्ञान से ही कृतकृत्यता हो पाती है, अतः मुमुक्षु को उसी के लिये यत्न करना चाहिये । जाति आदि सम्बन्ध तथा कर्मों के सहित अन्य समस्त वाक्यों का त्याग करके सर्वदा सब के आधारभूत ॐ शब्दवाच्य शुद्ध आत्मा के शरण जाओ । मुण्डक श्रुति कह रही है— "यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतं मनः सह प्राणैश्च सर्वैः । तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथामृतस्यैष सेतुः४ ।” “ओमित्येवं ध्यायथ आत्मानम्५"—जिसमें द्युलोक, पृथिवी, अन्तरिक्ष और सम्पूर्ण प्राणों के सहित मन ओत-प्रोत है, उस एक आत्मा को ही जानो, और सब बातों को छोड़ो, यही अमृत का सेतु (साधन) है। उस आत्मा का ॐ के रूप में ध्यान करो । इनके अतिरिक्त अन्य जो वाक्य हैं, वे सब अनात्मविषयक प्रवृत्तिपरक हैं। 'सर्वम्' का अर्थ सर्वाधारभूत और 'शुद्धम्' का अर्थ विविक्त अर्थात् निर्विशेष समझना चाहिये ।। ७६ ।। सेतुं सर्वव्यवस्थानामहोरात्रादिवर्जितम् । तिर्यगूर्ध्वमधः सर्वं सकृज्ज्योतिरनामयम् ॥७७॥ सेतुमिति—वह आत्मा वर्णाश्रमादि सभी मर्यादाओं का सेतु है, दिन-रात्रिरूप काल से भी परे है अर्थात् उसे काल का स्पर्श तक नहीं हो पाता । ऊपर-नीचे-पार्श्व भाग में यानी सभी ओर वह विद्यमान है। वही एक मात्र ज्योतिः- स्वरूप और निर्दोष (अनामय) है ।। ७७ ।।
- सम्बन्धं—पाठान्तरम् । † सदात्मानं— पाठान्तरम् । १. ( छां. उ. ७।२५।२ ) २. ( छां. उ. ७।२५।२ ) ३. ( तै. आ. ३।१३ ) ४. ( मु. उ. २।२।५ ) ५. ( मु. उ. २।२।६ ) २३