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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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Page 204

यहाँ दिए गए पृष्ठ का संपूर्ण पाठ (transcription) प्रस्तुत है:

१७८ उपदेशसाहस्री —वह शरण्य (प्रतिपत्तव्य) आत्मा समस्त वर्णाश्रमादि मर्यादाओं का सेतु (विधारक) है। छान्दोग्य श्रुति बता रही है—"अथ य आत्मा स सेतुर्विधृतिरेषां लोकानामसंभेदाय नैतं सेतुमहोरात्रे तरतः............ सकृद्विभातो ह्येवैष ब्रह्मलोकः।"१ जो आत्मा है, वह इन लोकों के पारस्परिक असंघर्ष (असंभेद) के लिये इन्हें विशेष- रूप से धारण करने वाला सेतु है। दिन और रात्रि (अहोरात्र) भी इस सेतु का अतिक्रमण नहीं कर पाते। इस सेतु को न जरा, न मृत्यु, न शोक और न सुकृत या दुष्कृत ही प्राप्त हो सकते हैं। संपूर्ण पाप इससे निवृत्त हो जाते हैं, क्योंकि यह ब्रह्मलोक पापशून्य है। यह ब्रह्मलोक सर्वदा प्रकाशस्वरूप है। तात्पर्य यह है कि मुक्ति प्राप्ति में यह आत्मरूप सेतु रात्रि-दिवसादि से रहित और ऊपर-नीचे, इधर-उधर सब ओर विद्यमान, एकमात्र ज्योतिःस्वरूप और अनामय (दोषरहित) है ॥ ७७ ॥ धर्माधर्मविनिर्मुक्तं भूतभव्यात्कृताकृतात् । स्वमात्मानं परं विद्याद्विमुक्तं सर्वबन्धनैः ॥७८॥ धर्माधर्मेति—धर्म और अधर्म से भी रहित (विनिर्मुक्त) तथा भूत-भविष्य और कार्य-कारण से भिन्न और सभी प्रकार के बन्धनों से मुक्त रहने वाले अपने आत्मा को जानना चाहिये ॥ ७८ ॥ हृदयस्पर्शिनी वह शरण्य आत्मा, धर्माऽधर्म से शून्य, भूत-भविष्य और कार्य-कारण से भिन्न तथा सर्वविध समस्त बन्धनों से मुक्त है, ऐसा समझते रहना चाहिये। काठक श्रुति कह रही है—"अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृता- कृतात् । अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद्वद२।" जो धर्म से पृथक्, अधर्म से पृथक् तथा इस कार्य-कारणरूप प्रपञ्च से भी पृथक् है, और जो भूत एवं भविष्य से भी अन्य है—ऐसा आप जिसे देखते हैं, वही मुझे बताइये। इसी श्रुत्यर्थ को श्लोक के द्वारा बताया गया है। 'कृताऽकृतात्' का अर्थ कार्य-कारण से है ॥ ७८ ॥ अकुर्वन्सर्वकृच्छुद्धस्तिष्ठन्नत्येति धावतः । मायया सर्वशक्तित्वादजः सन् बहुधा मतः ॥७९॥ अकुर्वन्निति—वह आत्मा कुछ न करता हुआ भी सब कुछ करता है, वह शुद्ध है, वह स्थित रहता हुआ भी तेजी से दौड़नेवाले मन से भी आगे निकल जाता है, वह अजन्मा रहने पर भी माया के कारण सर्वशक्तिसम्पन्न होने से उसको अनेक प्रकार का भी कहा गया है ॥ ७९ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा को कर्ता, भोक्ता आदि कहने के कारण उसे बन्धनों से सर्वथा मुक्त कैसे कह सकते हैं? यह शंका हो सकती है, किन्तु उसके कर्तृत्व श्रवण के साथ ही उसका अकर्तृत्व भी सुना जाता है, तब एक ही वस्तु में दो विरुद्ध स्वभावों का सम्बन्ध हो नहीं सकता, अतः कहना होगा कि स्वभाव से प्राप्त कर्तृत्वादिक तो मायामय है, और अकर्तृत्वादिक प्रमाणसिद्ध है, वह आत्मस्वभाव है, यही दोनों में अन्तर है, इसी को बताने वाली अर्थात् विरुद्धधर्मवादिनी श्रुतियां हैं। श्लोकगत 'अकुर्वन्' से 'अनेजदेकं मनसो जवीयः३' इस मन्त्रभाग के अर्थ को बताया गया है। उसी तरह 'शुद्धः' से 'शुद्धमपापविद्धम्' का अर्थ बताया है। 'तिष्ठन्' से 'तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्'४ का अर्थ बताया है। 'अजः सन् बहुधा मतः' से 'अजायमानो बहुधा विकायते'५ का अर्थ बताया है। उपर्युक्त सभी में 'मायया सर्वशक्तित्वात्' हेतु दिया है, अर्थात् माया के लिये कोई बात असंभव नहीं है, माया तो 'अघटितघटना- १. (छां. उ. ८।४।१-२) २. (कठ. उ. २।१४) ३. (ई. उ. ४।) ४. (कठ. उ. २।१४) ५. (तै. आ. ३।१३)