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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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सम्यङ्मतिप्रकरणम् १७९

पटीयसी' कहलाती है। निष्कर्ष यह है कि वह कुछ न करते हुए भी सब कुछ करनेवाला है, शुद्ध है, स्थित रहते हुए भी दौड़नेवाले मन आदि से आगे निकल जाता है, तथा माया के द्वारा सर्वशक्तिसम्पन्न होने के कारण वह अजन्मा होते हुए भी अनेक प्रकार से माना जाता है। मन, प्राण आदि अत्यन्त वेगवान् हैं, इनसे अधिक वेगवान् संसार में अन्य कोई नहीं देखा गया है, किन्तु इस आत्मा का वेग उनसे भी कहीं अधिक है, वह उनका भी उल्लंघन कर जाता है। क्योंकि जहाँ कहीं मन, प्राण आदि पहुँचते हैं, वहाँ सर्वत्र पहले से ही आत्मचैतन्य अभिव्यक्त हुआ पाया जाता है। अतः आत्मा स्थिर स्थित रहता हुआ भी चलता हुआ-सा (गच्छतीव) प्रतीत होता है ॥ ७९ ॥

राजवत्साक्षिमात्रत्वात्सांनिध्याद्भ्रामको यथा । भ्रामयञ्जगदात्मानं निष्क्रियोऽकारकोऽद्वयः ॥८०॥

राजवदिति—चुम्बक जैसे अपने सान्निध्यमात्र से लोहखण्ड का परिभ्रामक होता है, वैसे ही समस्त जगत् को घुमाता हुआ भी मैं (आत्मा) राजा के समान साक्षिमात्र हूँ, अतः मैं निष्क्रिय, अकर्ता और अद्वितीय हूँ ॥ ८० ॥

हृदयस्पर्शिनो

निष्क्रिय में भी क्रियावान् का जो उपचार किया गया है, उसी को दृष्टान्त देकर बताया जा रहा है। जैसे चुम्बक अपनी सन्निधिमात्र से लोहखण्ड को नचा देता है, वैसे ही समस्त जगत् को परिभ्रमण कराता हुआ भी यह आत्मा राजा के समान साक्षिमात्र है, अतः वह मैं आत्मा, निष्क्रिय, कर्तृत्वरहित और अद्वितीय हूँ ॥ ८० ॥

निर्गुणं निष्क्रियं नित्यं निर्द्वन्द्वं यन्निरामयम् । शुद्धं बुद्धं तथा मुक्तं तद्ब्रह्मास्मीति धारयेत् ॥८१॥

निर्गुणमिति—जो निर्गुण, निष्क्रिय, निर्द्वन्द्व, निरामय और शुद्ध, बुद्ध, मुक्त स्वरूप ब्रह्म है, वही 'मैं' हूँ—यह निश्चित रूप से समझना चाहिये ॥ ८१ ॥

हृदयस्पर्शिनो

जबकि आत्मा स्वयं (स्वतः) नित्य शुद्धस्वभाव का है और यह बात शास्त्र तथा न्याय से अवगत होती है, इस कारण उस आत्मा को उसी तरह जाना जाय' अन्यथा नहीं। जो निर्गुण, निष्क्रिय, निर्द्वन्द्व, निरामय एवं शुद्ध, बुद्ध,मुक्तस्वरूप ब्रह्म है, वही मैं हूँ—ऐसा दृढ़ निश्चय करना चाहिए। इन श्लोकों में यद्यपि पुनरुक्ति दृष्टिगोचर होती है, तथापि वह दोषावह नहीं है¹। क्योंकि प्रतिपाद्य बहुत दुर्बोध है, उस कारण मुमुक्षु पर उपकार करने के लिए परम कारुणिक आचार्य कभी शास्त्र के द्वारा, कभी फल बताकर, कभी विद्वानों के अनुभवों को बताकर पुनः पुनः उसी बात को बताया करते हैं। 'भूयोऽपि पथ्यं वक्तव्यम्' यह नियम है ॥ ८१ ॥

बन्धं मोक्षं च सर्वं यत इदमुभयं हेयमेकं द्वयं च *ज्ञेयाज्ञेयाभ्यतीतं परममधिगतं तत्त्वमेकं विशुद्धम् । विज्ञायतैद्यथावच्छ्रुतिमुनिगदितं शोकमोहावतीतः सर्वज्ञः सर्वकृत्स्याद्भवभयरहितो ब्राह्मणोऽवाप्तकृत्यः ॥८२॥

बन्धमिति—बन्ध-मोक्ष और ये दोनों जिन कारणों (अज्ञान-ज्ञान) से उपलब्ध होते हैं, उनको भी तथा एक (कारण) और अनेक (कार्य) रूप विषयों को भी त्याज्य समझकर, तथा श्रुति और मुनियों के द्वारा प्रतिपादित जो समस्त ज्ञेय हैं, उससे भी अतीत (परे) एक विशुद्ध आत्मतत्त्व है, उसका सम्यक् अनुभव करके ब्रह्मज्ञानी पुरुष शोक-मोह से अतीत (वह सर्वज्ञ, सर्वकृत्, संसारभय से रहित) और कृत-कृत्य हो जाता है ॥ ८२ ॥


१. "पौनरुक्त्यं न दोषोऽत्र शब्देनार्थेन वा भवेत् । अभ्यासेन गरीयस्त्वमर्थस्य प्रतिपाद्यते ॥" [ मानसोल्लास-८।४—इससे तुलना करिये ।] * ज्ञेयं