BharatKosha
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

Page 206 of 364

Read in context
Page 206

१८० उपदेशसाहस्री उक्त प्राकरणिक अर्थ का अनायास ज्ञान कराने के निमित्त संक्षेप में बता रहे हैं—बन्ध और मोक्ष कायथा- वत् ज्ञान प्राप्त करके भव-भय से रहित होना चाहिए। प्रमातृत्व (ज्ञातृत्व), कर्तृत्ववादि का प्रतिभास होते रहना ही 'बन्ध' है और ब्रह्मस्वरूप में अवस्थित रहना ही 'मोक्ष' है। ये दोनों (बन्ध और मोक्ष) जिन हेतुओं (अज्ञान और ज्ञान) से होते हैं, उन्हें भी जानना चाहिए। अर्थात् बन्ध-मोक्ष और उनके कारणों को, उसी तरह एक अर्थात् कारण और द्वय यानी अनेक (कार्य) अर्थात् कार्य-कारणात्मक विषय को हेय (बाध्य) जानकर तथा श्रुति-मुनिगदित अर्थात् श्रुति- वाक्य के द्वारा गुरु (मुनि) ने जिसका उपदेश किया है और वेदान्तवाक्यों में उपलब्ध होनेवाले तथा समस्त ज्ञेय वर्ग से परे एक विशुद्ध परतत्त्व है, उसे यथार्थरूप से अनुभव कर अर्थात् अनात्म पदार्थों से उसे पृथक् समझकर आत्मतत्त्व- निष्ठ होनेवाला मुमुक्षु शोक, मोह से अतीत, सर्वज्ञ, सर्वकर्मा, संसारभय से रहित और कृत-कृत्य हो जाता है। इसी अभिप्राय को ईशावास्योपनिषद् ने भी बताया है१। सर्वात्मकता तो एकमात्र ब्रह्म में है, उसे जानकर कौन सर्वज्ञ नहीं होगा। उसी तरह अपनी आत्मा में समस्त को एक करनेवाला ही सर्वकृत् समझने योग्य होता है। श्रुति भी ऐसे मुक्त के विषय में बता रही है—'अहं विश्वं भुवनमभ्यभवा३म्'२। इस श्रुति में दीर्घता का प्रयोग गाने के लिये किया गया है। (अभ्यभवम् का अर्थ मैंने 'अपने स्वाधीन' कर लिया है।) भवभयरहित होने में 'न बिभेति कुतश्चन'३ श्रुति प्रमाण है। उक्त पद्य में 'ब्राह्मण' शब्द का अर्थ मुख्य वृत्ति से ब्राह्मण ही समझना चाहिए। क्योंकि बृहदारण्यक श्रुति कह रही है—'अमौनं च मौनं च निर्विद्याथ ब्राह्मणः४ और 'अथ य एतदक्षरं गार्गि विदित्वास्माल्लोकात्प्रैति स ब्राह्मणः'५। उक्त दो श्रुतियों का अर्थ क्रमशः इस प्रकार है—अमौन और मौन का पूर्णतया संपादन करके ब्राह्मण कृतकृत्य हो जाता है। तथा हे गार्गी ! जो इस अक्षर को जानकर इस लोक से मरकर जाता है, वह ब्राह्मण है। मुमुक्षु की अवाप्तकृत्यता में यह श्रुति है—'सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह । ब्रह्मणा विपश्चिता'६। इसी अभिप्राय को स्मृति भी कह रही है—'एतद्बुध्वा बुद्धिमान् स्यात् कृतकृत्यश्च भारत'७—ब्रह्मभूत विद्वान् ब्रह्मस्वरूप से ही एक साथ सम्पूर्ण भोगों को प्राप्त करता है। अन्य लोगों के समान क्रम से नहीं। समस्त कर्मफल उसे प्राप्त हुए रहते हैं ॥ ८२ ॥ न स्वयं स्वस्य *नान्यश्च नान्यस्यात्मा च हेयगः । उपादेयो न चाप्येवमिति सम्यङ्मतिः स्मृता ॥८३॥ न स्वयमिति—स्वयं आत्मा न अपना हेय है और न उपादेय है, उसी तरह परमात्मा (अन्य) भी न अपना हेय है और न उपादेय है, इस प्रकार की निष्ठा को ही सम्यक् ज्ञान कहा गया है ॥ ८३ ॥ हृदयस्पर्शिनो पूर्वोक्त आत्मज्ञानी की कृतकृत्यता को ही स्पष्ट कर रहे हैं—आत्मा (स्वयं) अपना हेय या उपादेय नहीं है, क्योंकि एक ही में कर्म-कर्तृत्व का होना संभव नहीं। और स्वरूप की स्थिति या नाश होने पर स्वविषय का हान (त्याग)-उपादान नहीं हो सकता। और उसी प्रकार अन्य (परमात्मा) भी अपना हेय या उपादेय नहीं है। क्योंकि अद्वैत रहने पर अन्य का अभाव ही है। उसी कारण वह उपादेय भी नहीं। उसी तरह अन्य के द्वारा भी यह उपादेय अथवा हेय नहीं हो सकता, क्योंकि आत्मान्तर है ही नहीं। और अनात्मा तो बाधित ही है, और वह अचेतन्य भी है। इस प्रकार की निष्ठा को ही सम्यग् ज्ञान कहा गया है। तस्मात् इस प्रकार जाननेवाला कृत-कृत्य हो जाता है ॥ ८३ ॥

  • नान्यस्य नान्यश्चात्मा — पाठान्तरम्। १. (ई. उ. ७) २. (तै. उ. ३।१०) ३. (तै. उ. २।९) ४. (बृ. उ. ३।५।१) ५. (बृ. उ. ३।८।१०) ६. (तै. उ. २।१) ७. (भ. गी. १५।२०)