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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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Page 209

तत्त्वमसिप्रकरणम्* येनात्मना विलीयन्ते उद्भवन्ति च वृत्तयः। नित्यावगतये तस्मै नमो †धीप्रत्ययात्मने ॥१॥ येनेति—अन्तःकरण की वृत्तियाँ जिस आत्मचैतन्य से उत्पन्न होती हैं और उसी में लीन हो जाती हैं, उस आत्मचैतन्य के लिए मेरा प्रणाम है। वह आत्मचैतन्य, बुद्धिवृत्तियों का अधिष्ठान और नित्यज्ञानस्वरूप है ॥१॥ हृदयस्पर्शिनी आक्षेप—ब्रह्मात्मविषयक अपरोक्ष (प्रत्यक्ष) ज्ञान, मोक्ष का साधन है, और वह वेदान्तवाक्यों से होता है, यह पूर्व- प्रकरण में कहा गया है। किन्तु वह ठीक नहीं है, क्योंकि वेदान्तवाक्य भी स्वर्गकामादि वाक्यों के तुल्य ही परोक्षज्ञान ही कराते हैं, अपरोक्षज्ञान तो प्रसंख्यान से ही होता है। अतः प्रसंख्यान के लिये ही प्रयत्न करना चाहिये, ऐसा कुछ लोग कहते हैं। समाधान—उनके कथन का निराकरण करने के लिये पूर्वकथित अपने सम्पूर्ण सिद्धान्त को वेदानुकूल एवं तर्कपूर्ण प्रतिपादन करने की इच्छा से प्रकारणान्तर का प्रारंभ करते हुए देवतानमस्कारात्मक मङ्गल करने के व्याज (बहाने) से अन्तःकरण की वृत्तियों के भाव-अभाव का साक्षी, कूटस्थ चिदेकतान (ज्ञानरुप) नित्य अपरोक्ष ब्रह्म है, ऐसा प्रतिपादन करनेवाले वेदान्तवाक्य 'ब्रह्म' का परोक्ष ज्ञान नहीं कराते हैं। वह अपरोक्ष ब्रह्म ही इस प्रकरण का प्रतिपाद्य है। जिस आत्मस्वरूप से अन्तःकरण को वृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं, विलीन होती रहती हैं, उन बुद्धिवृत्तियों के अधिष्ठानभूत नित्यज्ञानस्वरूप आत्मा को प्रणाम है। ये वृत्तियाँ साभास बुद्धि की परिणामरूप हैं ॥ १ ॥ प्रमथ्य वज्रोपमयुक्तिसंभृतैः श्रुतेररातीञ्शतशो ‡वचोऽसिभिः। ररक्ष वेदार्थनिधिं विशालधीः नमो यतीन्द्राय गुरोर्गरीयसे ॥२॥ प्रमथ्येति—उन यतिराज परमगुरुचरणों (श्रीगौड़पादाचार्य) को मेरा प्रणाम है, जिन महान् मेधावी गुरुचरणों ने वज्रोपम अकाट्य युक्तियों से और खड्गरूप सैकड़ों वेदान्तवाक्यों से भगवती श्रुतिमाता के शत्रुओं का पराभव कर वेदार्थरूप निधि (कोष) की रक्षा की है ॥ २ ॥ हृदयस्पर्शिनी अब अपने द्वारा प्रतिपादन किये जानेवाले अर्थ में मुमुक्षुओं का विश्वास उत्पन्न कराने हेतु स्वाचार्य के गुणों का वर्णन करते हुए सम्प्रदायशुद्धि को बता रहे हैं—जिस अप्रतिहत विशाल बुद्धिवाले ने वज्रतुल्य अभेद्य (अकाट्य) तर्कों से और खड्गरूप सैकड़ों (शतशः) वेदान्तवाक्यों द्वारा श्रुति (वेद) के शत्रुओं (अरातियों) का संहार कर वेदार्थरूप कोष (जो वेदान्तमञ्जूषा में रखा हुआ है, उस अद्वय ब्रह्मात्मतत्त्व रूप कोष) की सुरक्षा की है, उस यतिशिरोमणि परमगुरुदेव श्रीगौड़पादाचार्य को मेरा प्रणाम है ॥ २ ॥ नित्यमुक्तः सदेवास्मोत्येवं चेन्न भवेन्मतिः। किमर्थं श्रावयत्येवं मातृवच्छ्रुतिरादृता§ ॥३॥ नित्यमिति—वेदान्तवाक्यों से 'मैं नित्यमुक्त सत् ही हूँ'—यह अपरोक्ष ज्ञान यदि नहीं होता, तो माँ के तुल्य हितकामना करनेवाली भगवती श्रुति, आदरपूर्वक उनको क्यों सुना रही है ? ॥ ३ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार प्रणाम के व्याज (मिष) से प्रकरणार्थ और स्वसम्प्रदायशुद्धि को बताकर, अब 'तत्त्वमस्यादि वाक्य' से ही आत्मा का अपरोक्षज्ञान (प्रत्यक्षज्ञान) होता है इस प्रकरणसिद्धान्त को कह रहे हैं। वेदान्तवाक्य से 'सदेवास्मि' मैं नित्यमुक्त सत् ही हूँ, यह अपरोक्ष ज्ञान यदि न होता, तो माता के समान पुत्रहितैषिणी श्रुति सिद्धवत् निर्देश के समान उसे आदर पूर्वक श्रवण ही क्यों कराती ? ॥ ३ ॥

  • तत्त्वमति.—पाठान्तरम् । † धीप्रत्यगात्मने—पाठान्तरम् । ‡ वचोबलैः—पाठान्तरम् । § रादरात्—पाठान्तरम् ।