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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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१८४ उपदेशसाहस्री सिद्धादेवाहमित्यस्माद्युष्मद्धर्मो निषिध्यते । रज्ज्वामिवाहिर्धीर्युक्त्या तत्त्वमित्यादिशासनैः ॥४॥ सिद्धादेवेति—रज्जु में भ्रमवश होनेवाली सर्पबुद्धि जैसे दूर हो जाती है, वैसे ही युक्तिपूर्वक ‘तत् त्वम् असि’—तू वह ब्रह्म है—इत्यादि गुरुपदेश के द्वारा ‘अहम्’ पद का लक्ष्य जो आत्मा, उससे ‘अहंकारादि’ अनात्मधर्मों का निषेध किया जाता है ॥ ४ ॥ हृदयस्पशिनी नित्य अपरोक्षस्वभाव आत्मस्वरूप ब्रह्म का अपरोक्षज्ञान वेदान्तवाक्यों से ही प्राप्त करने पर आरोपित अनर्थ की निवृत्ति हो जाती है । जिस प्रकार रज्जु पर आरोपित हुई सर्पबुद्धि निवृत्त हो जाती है, उसी प्रकार तर्कपूर्वक ‘तू वह (ब्रह्म) है’ इत्यादि वेदान्तवाक्योपदेशों से ‘अहं’ पद के लक्ष्य आत्मा से अहंकारादि अनात्मधर्मों का निषेध किया जाता है । अर्थात् ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ इस अनुभव में ‘अहं’ शब्द से लक्षित, अपरोक्षतया स्वतःसिद्ध आत्मा में तत्-त्वम् पदार्थ का शोधन कर ‘तत्त्वमसि’ के उपदेश से युष्मद्धर्म (तू का धर्म) अहंकारादि पराक् अर्थ का निषेध किया जाता है । निष्कर्ष यह है कि भ्रम से पारोक्ष्य सदृश्यता के आकार का जो ग्रहण हुआ था, उसका विलापन कर आत्मतत्त्व का प्रतिपादन किया जाता है ॥ ४ ॥ शास्त्रप्रामाण्यतो ज्ञेया धर्मादेरस्तिता यथा । विषापोहो यथा ध्यानाद् *ह्रुतिः स्यात्पाप्मनस्तथा ॥५॥ शास्त्रेति—शास्त्रप्रमाण के द्वारा ‘धर्मादि’ के अस्तित्व का जिस प्रकार ज्ञान होता है, तथा गारुडादि मन्त्र बीज के ध्यान (जप) से ‘विष’ की निवृत्ति होती है, उसी प्रकार वेदान्तवाक्यों से उत्पन्न होनेवाले तत्त्वज्ञान से ‘अज्ञान’ रूप पाप की निवृत्ति होती है ॥ ५ ॥ हृदयस्पशिनी अनर्थनिवृत्ति को दो दृष्टान्त देकर स्पष्ट करते हैं, अथवा नित्य अपरोक्ष आत्मा ही ब्रह्म है और उसका अवगम (ज्ञान) अनर्थनिवृत्ति का कारण है, इसे यथाक्रम दो दृष्टान्तों से सिद्ध करते हैं—जिस प्रकार शास्त्रप्रमाण से धर्मादि के अस्तित्व का ज्ञान होता है, अथवा गारुड़ादि मन्त्रबीज के स्मरण से सद्यः (तत्काल) विषनिवृत्ति होती है, उसी प्रकार वेदान्तवाक्य से उत्पन्न हुए तत्त्वज्ञान से अज्ञानरूप पाप का विनाश होता है। ब्रह्म ही आत्मा के रूप में विद्यमान है, उसकी अस्तिता (विद्यमानता) में ‘अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य’१, ‘तत्त्वमसि’२ इत्यादि शास्त्रप्रामाण्य से समझनी चाहिये । उस ‘सत्सञ्ज्ञक’ देवता ने ईक्षण किया, मैं इस जीवात्मा के रूप से इन तीनों देवताओं में अनुप्रवेश कर नाम और रूप की अभिव्यक्ति करूँ । वह जो यह अणिमा है, तद्रूप ही यह सब है। वह सत्य है, वह आत्मा है। हे श्वेतकेतो ! ‘वही तू है’, तब आरुणि के इस प्रकार कहने पर श्वेतकेतु बोला—‘भगवन् ! मुझे पुनः समझाइये । तब आरुणि ने कहा—‘अच्छा सौम्य ! ॥ ५ ॥ सद्ब्रह्माहं करोमीति प्रत्ययावात्मसाक्षिकौ । तयोरज्ञानजस्यैव त्यागो युक्ततरो मतः ॥६॥ सदिति—‘मैं सत्स्वरूप ब्रह्म हूँ’ और ‘मैं करता हूँ’ ये दोनों ही ज्ञान ‘आत्मा’ के साक्षित्व में होते हैं । इन दोनों ज्ञानों में से ‘मैं करता हूँ’—यह जो अज्ञान से होनेवाला प्रत्यय है, उसी का त्याग अधिक उचित माना जाता है ॥ ६ ॥

  • निवृत्तिः पा. —पाठान्तरम् । १. (छां. उ. ६।३।२) ‘सेयं देवतैक्षत हन्ताहमिमास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणीति ॥ २ ॥ २. (छां. उ. ६।८।७) ‘स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिद ँ सर्वं तत्सत्य ँ स आत्मा “तत्त्वमसि” श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ७ ॥
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