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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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१९४ उपदेशसाहस्री किया जाता है। जिस प्रकार उल्मुक आदि में अग्नि के दाहादि कार्य का प्रयोग किया जाता है। जिस समय खूब तपे हुए लोहे से त्वचा का स्पर्श होने पर दाह होता है, तो 'लोहे ने जला दिया' ऐसा लोग कहा करते हैं किन्तु यदि विचार करें तो मानना होगा कि जलाना लोहे का धर्म (काम) नहीं है, किन्तु व्यवहार के समय लोहे में अग्नि के धर्म का आरोप करते हैं। वैसेही आत्मवत् प्रतीत होनेवाले अहंकार में आत्मत्व का आरोप होता है और उसे ही आत्मा शब्द से कहने लगते हैं। तात्पर्य यह है कि आत्माभास से युक्त अहंकार आदि में वर्तमान शब्द, उसके साक्षी को लक्षित करते हैं, साक्षात् नहीं बताते हैं। जैसे 'उल्मुकं दहति' 'अयो दहति'—इत्यादि प्रयोगों में उल्मुकादि शब्दों का प्रयोग साक्षात् अग्नि में नहीं होता है, उनका अर्थ तो अंगार आदि है। तथापि दाह को अनुपपत्ति के कारण उनका 'अग्नि' अर्थ मान लिया जाता है। उसी तरह लक्षणा के द्वारा अहं, आत्मा आदि शब्द, ब्रह्मात्मप्रतिपत्त्यर्थक होते हैं ॥ ३१ ॥ मुखादन्यो मुखाभासो यथाऽऽदर्शानुकारतः । आभासान्मुखमप्येवमादर्शाननुवर्तनात् ॥३२॥ मुखादिति—जिस प्रकार मुख का 'प्रतिबिम्ब' दर्पण का अनुवर्ती होने के कारण मुख से पृथक् है, उसी प्रकार 'मुख' भी दर्पण का अनुवर्ती न होने के कारण अपने 'प्रतिबिम्ब' से भिन्न ही रहता है ॥ ३२ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्वोक्त २९ वें श्लोक में सिद्धान्ती ने 'आभास' का अंगीकार किया है। भेदविपर्यासवशिष्टरूप से भासित होने वाला वह अहंकार, पारमार्थिक है या अपारमार्थिक है ? ऐसा सन्देह होने पर सिद्धान्त बताते हैं कि वह परमार्थतः नहीं है, उसमें दृष्टान्त बता रहे हैं—जैसे मुख का प्रतिबिम्ब दर्पण का अनुवर्तन करने के कारण मुख से भिन्न होता है, वैसे ही दर्पण का अनुवर्तन न करने के कारण मुख भी अपने प्रतिबिम्ब से भिन्न ही है। तथा बिम्ब की चेष्टा के बिना भी प्रति- बिम्ब की चेष्टा हो सकेगी, क्योंकि आभास से मुख भी अन्य ही है। वह आदर्श (दर्पण) के अन्वय-व्यतिरेक का अनुविधायी नहीं है। उसकी सत्ता का स्फुरण आदर्शनिरपेक्ष होता है। इसलिये वह (मुख) आदर्शानिनुवर्ति है। तथाच आदर्श में प्रतिबिम्बित हुए ग्रीवास्थ मुख का आदर्शस्थतावैशिष्ट्य से भासमान होना ही 'आभास' कहा जाता है। वह आभास सत्य नहीं है, क्योंकि आदर्श, मुख से वियुक्त होने पर अथवा तिर्यक् निरीक्षण करने पर उस आदर्श में नहीं दिखाई पड़ता। उसे असत् भी नहीं कह सकते, क्योंकि उसका अपरोक्ष (प्रत्यक्ष) प्रतिभास होता है। अतः आभास को अनिर्व- चनीय ही कहा जाता है। तस्मात् उस आभास से मुख अन्य ही है ॥ ३२ ॥ अहंकृत्यात्मनिर्भासो मुखाभासवदिष्यते । मुखवत्स्मृत आत्माऽन्योऽविविक्तौ तौ तथैव च ॥३३॥ अहमिति—अहंकार में आत्मा का जो प्रतिबिम्ब है, वह मुख के प्रतिबिम्ब के ही तुल्य है, और उस प्रतिबिम्ब से भिन्न जो आत्मा है, वह मुख के तुल्य बताया गया है। एवञ्च मुख और मुखाभास के समान ही वे परस्पर भिन्न हैं ॥ ३३ ॥ हृदयस्पर्शिनी अहंकार में आत्मा का प्रतिबिम्ब (चेतनावत्त्व का अवभास) मुख के प्रतिबिम्ब के तुल्य है और उससे भिन्न आत्मा, मुख के तुल्य बताया गया है। उन मुख और मुखाभास के समान ही वे प्रातिभासिक दृष्टि से परस्पर भिन्न हैं। वस्तुतः आत्मा के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है, अतः भेद वस्तुतः नहीं है। आत्मा, आत्माभास तथा मुख और मुखाभास वास्तव में अविविक्त हैं अर्थात् परमार्थतः भेदरहित हैं। 'च' कार से आभासाश्रय अन्तःकरण भी उस से विविक्त नहीं है ॥ ३३ ॥ संसारी च स इत्येक आभासो यस्त्वहंकृतिः । वस्तुच्छाया स्मृतेरन्यन्माधुर्यादि च कारणम् ॥३४॥ संसारीति—कुछ विद्वान्, आत्मा के आभासरूप अहंकार को (चिदाभास को) ही 'संसारी जीव' कहते हैं। स्मृतिवचन के अनुसार छाया भी भावरूप पदार्थ (वस्तु) है तथा उसके वस्तुरूप होने में माधुर्य, शीतलता भी कारण हैं ॥ ३४ ॥

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