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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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तत्त्वमसिप्रकरणम् १९५ हृदयस्पर्शिनी अनादि अविद्या और उसके कार्यभूत अहंकारादि में प्रतिबिम्बित हुआ चिन्मात्र ही चिदात्मस्वरूप है, उसी को उपाधिस्थतारूप वैशिष्ट्य के अध्यास के कारण संसारी कहते हैं, इस प्रकार अपना मत बताकर, उसे ही दृढ़ करने के लिये मतान्तर बता रहे हैं। हमने अहंकार में जिस आभास को पृथक् बताया है, उसी को कुछ लोग 'संसारी' कहते हैं। किन्तु प्रश्न यह उपस्थित होता है कि आभास तो अवस्तुरूप है, उसे बन्ध-मोक्ष का भागी मानकर संसारी कैसे कहा जा सकता है ? उक्त प्रश्न का उत्तर यह है कि 'आभास' शब्द से 'चिच्छाया' अभिप्रेत है। और वह वस्तुरूप है, अवस्तु नहीं है। अतः कोई अनुपपत्ति नहीं है। स्मृति ने भी 'नाक्रमेत् कामतश्छायां गुर्वादि:'१ कहकर बताया है कि जानबूझकर गुरु आदि की छाया का अतिक्रमण न करे। याज्ञवल्क्य स्मृति में भी कहा है— 'देवत्विक्स्नातकाचार्यराज्ञां छायां परस्त्रियः। नाक्रमेद्रक्तविण्मूत्रष्ठीवनोद्वर्तनादिकम्२ ।।' देवता, ऋत्विज्, स्नातक, आचार्य, राजा, परस्त्री की छाया, रक्त, विष्ठा, मूत्र, थूँक, उद्वर्तनादि को न लांघे—इस प्रकार छाया के अतिक्रमण का निषेध किया है। इससे स्पष्ट है कि 'छाया' वस्तुरूप है, अवस्तु नहीं है। यदि छाया वस्तुरूप न होती तो उसका अतिक्रमण करने पर कोई दोष नहीं हो सकता था। उसी प्रकार छाया के वस्तु होने में एक अन्य कारण माधुर्यादि भी है। ग्रीष्म से संतप्त होने पर छाया में बैठे हुए मनुष्यादि प्राणी का मुख, मधुर दिखाई देता है, तथा उसे शीतलता का अनुभव होता है, इस से भी छाया का वस्तुत्व स्पष्ट होता है ॥ ३४ ॥ जैकदेशो विकारो वा तदभासाश्रयः परे। अहंकर्तैव संसारी स्वतन्त्र इति केचन ॥३५॥ जैकदेश इति—कुछ विद्वान् परमात्मा के एक देश को ही संसारी जीव कहते हैं। कुछ लोग उसके विकार को संसारी जीव कहते हैं। कुछ लोग चिदाभासविशिष्ट अहंकार को और कुछ लोग स्वतन्त्र आत्मा को ही संसारी जीव कहते हैं ॥ ३५ ॥ हृदयस्पर्शिनी पुनः एकदेशियों के तीन मतों को बता रहे हैं—कुछ लोग चित्-सत्-आनन्दरूप 'परमात्मा के एक देश' को 'संसारी' कहते हैं, क्योंकि “ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः”३ यह स्मृति कह रही है। कुछ लोग अग्निविस्फुलिंग का दृष्टान्त देकर उस परमात्मा के 'विकार' को 'संसारी' कहते हैं।४ कुछ लोग चिदाभास के आश्रय को अर्थात् चिदात्मा- भासविशिष्ट अहंकार (साभास अन्तःकरण) को ही 'संसारी' कहते हैं।५ भाट्टमत के अनुसार अहम् अर्थात् अहंकार ही 'संसारी' है, जो स्वतन्त्र है, परमात्मा का अंशादिरूप नहीं है ॥ ३५ ॥ अहंकारादिसंतानः संसारी नान्वयी *पृथक् । इत्येवं सौगता आहुस्तत्र न्यायो विचार्यताम् ॥३६॥ अहंकारेति—बौद्ध विद्वान् कहते हैं कि अहंकारादि क्षणिकविज्ञानसन्तति ही संसारी जीव है, उसमें कोई अन्वयी नहीं है। किन्तु इन सब मतों में कौन-सा मत न्यायोचित है, उसका विचार करना चाहिए ॥ ३६ ॥ हृदयस्पर्शिनी अहंकारेति—बौद्धमत के अनुसार अहंकारादि क्षणिकविज्ञानसन्तति (अविरल उदित होते रहने से जो विच्छिन्न नहीं है) अर्थात् क्षणिकज्ञानधारा ही संसारी है, उनसे पृथक् कोई एक अन्वयी (सबसे सम्बन्ध रखने वाला),

  • क्वचित्—पाठान्तरम् । १. (मनु. स्मृ. ४।१३०) २. (या. स्मृ. आचा. अध्या. ६।१५२) ३. (भग. गी. १५।७) ४. (बृ. उ. २।१।२०) माध्यन्दिन पाठ के अनुसार । काण्व पाठ के अनुसार “सर्वाणि भूतानिव्युच्चरन्ति” इति । ५. “तन्मनो दिशं दिशं पतित्वा”—(छां. उ. ६।८।२)