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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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१९६ उपदेशसाहस्री जो विज्ञानों की उत्पत्ति-विनाशों का द्रष्टा हो, ऐसा कोई नहीं है, यह सौगतों (बौद्धों) का कथन है। इन उक्त पक्षों में वस्तुविषय की दृष्टि से तथा विरोध को दृष्टि से विकल्प और समुच्चय का असंभव रहने के कारण किसी एक पक्ष की उपादेयता अथवा हमारे कथन के अनुसार अहंकारादिगत आभास का अविद्या के कारण विवेक न हो पाने से ब्रह्म ही संसारी है, इन सब मतों में कौनसा न्याययुक्त है, इसका विचार करना चाहिए ॥ ३६ ॥

संसारिणां कथा त्वास्तां प्रकृतं त्वधुनोच्यते । मुखाभासो य आदर्शे धर्मो नान्यतरस्य सः । द्वयोरेकस्य चेद्धर्मो *वियुक्तोऽन्यतरे भवेत् ॥३७॥

संसारिणामिति — संसारियों की बात तो यहीं रहने दें। प्रस्तुत विषय को (आभास के सम्बन्ध में) बताते हैं। दर्पण में मुख का जो प्रतिबिम्ब पड़ता है, वह 'दर्पण और मुख' इन दोनों में से किसी एक का धर्म नहीं है। यदि (वह) दोनों में से किसी एक का धर्म होता तो अन्य के न रहने पर भी वह हो सकता था ॥ ३७ ॥

हृदयस्पर्शिनी प्रसंगप्राप्त संसारियों की चिन्ता को यहीं पर त्यागकर प्रकृत आभासनिरूपण की प्रतिज्ञा कर रहे हैं—यहाँ से प्रतिपक्षी के मत का खण्डन आरंभ कर रहे हैं—दर्पण में मुख का जो प्रतिबिम्ब (आभास) दिखाई देता है, क्या वह मुख और आदर्श दोनों में से किसी एक का धर्म है, या मुख का ही धर्म है, अथवा दोनों का ही धर्म है, या दोनों से भिन्न कोई वस्त्वन्तर है? इतने पक्ष (विकल्प) उपस्थित होने पर 'धर्मो नान्यतरस्य सः' से प्रथम पक्ष का खण्डन कर रहे हैं—वह प्रतिबिम्ब, दर्पण और मुख इन दोनों में से किसी एक का धर्म नहीं है। यदि वह दोनों में से किसी एक का (अन्यतर का) धर्म होता तो अन्यतर के अभाव में भी वह प्रतिबिम्ब पड़ सकता था, किन्तु ऐसा होता नहीं। दर्पण या मुख दोनों में से किसी एक का भी अभाव रहने पर मुखाभास की प्रतीति नहीं होती। इस कारण वह मुखाभास (प्रतिबिम्ब) अन्यतर (किसी एक का) धर्म नहीं है ॥ ३७ ॥

मुखेन व्यपदेशात्स मुखस्यैवेति चेन्मतम् । नादर्शानुविधानाच्च मुखे †सत्यविभावतः ॥३८॥

मुखेनेति—यदि यह कहें कि मुख के द्वारा उसका उल्लेख होने के कारण वह 'मुख' का ही धर्म है किन्तु यह कहना उचित न होगा, क्योंकि वह दर्पण का अनुवर्ती है। दर्पण के न रहने पर मुख के रहते हुए भी वह (प्रतिबिम्ब) नहीं दीखता ॥ ३८ ॥

हृदयस्पर्शिनी 'मुखेन व्यपदेशात् स मुखस्यैवेति चेन्मतम्' से द्वितीय पक्ष को उपस्थित कर 'नादर्शानुविधानाच्च' से उसका खण्डन करते हैं। उसका (आभास-प्रतिबिम्ब का) मुख के द्वारा उल्लेख होता यदि माना जाता हो तो उसे (प्रतिबिम्ब को) मुख का ही धर्म कहते, किन्तु वैसा कहना उचित नहीं होगा, क्योंकि वह (प्रतिबिम्ब) दर्पण का अनुवर्ती है, और दर्पण के अभाव में मुख के रहते हुए भी वह दृष्टिगत नहीं हो पाता है ॥ ३८ ॥

द्वयोरेवेति चेत्तन्न द्वयोरेवाप्यदर्शनात् । अदृश्यस्य सतो दृष्टिः स्याद्राहोरिन्दुसूर्ययोः ॥३९॥

द्वयोरिति—यदि उसे दोनों का धर्म कहें तो भी ठीक न होगा, क्योंकि दोनों के रहने अथवा न रहने पर भी वह नहीं दिखाई देता। यदि उसे दोनों से भिन्न सत्य वस्तु कहें तो जिस प्रकार पूर्वसिद्ध राहु की प्रतीति, सूर्य और चन्द्रमा के अस्तित्व में ही होती है, उसी प्रकार अदृश्य किन्तु विद्यमान प्रतिबिम्ब की प्रतीति मुख और दर्पण का संयोग होने पर ही होती है ॥ ३९ ॥

  • वियुक्तेऽन्य० —पाठान्तरम् । † सत्यप्यभावतः। सत्यप्यभासतः—पाठौ ।