उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर
Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)
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Read in contextतत्त्वमसिप्रकरणम् १९९ हृदयस्पर्शिनी उपर्युक्त कथन के अनुसार तुम्हारे मत में संसार और मोक्ष का कोई आश्रय न रहने से उनकी अनुपपत्ति ही रही। क्योंकि आत्मा या उसका आभास या उसका आश्रय, ये सम्मिलित होकर अथवा इनमें से कोई एक भी संसार आदि का आश्रय नहीं कहा जा सकता। ज्ञातृत्व, कर्तृत्व, भोक्तृत्वादिलक्षण विकाररूप उपचय को ही संसार कहते हैं। और उसके आत्यन्तिक अपचय को मोक्ष कहते हैं। तथाच क्रमशः उन दोनों से संबन्ध रखने वाला विकारो कहा जायगा। ऐसी स्थिति में चैतन्यैकरस दृशि में संसारिता नहीं बन सकेगी, क्योंकि वह तो अविकारी (कूटस्थ) है। उसी तरह आभास में संसारिता नहीं बन सकेगी, क्योंकि पूर्वोक्त युक्ति से उसके अवस्तु होने का निश्चय हो चुका है, अतः जो वस्तु ही नहीं है अर्थात् शून्य है, उसमें किसी प्रकार का अतिशय होना संभव ही नहीं है। आभास के आश्रयरूप अहंकर्ता अर्थात् अहंकार में भी जडता (अचितित्व) होने से संसारिता नहीं बन सकेगी। ज्ञातृत्व-सुख-दुःखादि-भोक्तृत्वलक्षण संसार की जडाश्रयता संभव नहीं है। अतः तुम्हारे मत में किसकी संसारिता होगी या मोक्ष होगा ? कहना होगा कि किसी का नहीं, तब अनुभवविरोध होगा। अभिप्राय यह है कि अविकारी होने के कारण साक्षी का संसारित्व नहीं होगा, आभास अवस्तुरूप होने के कारण संसारी नहीं होगा, और अहंकार जड़ होने से संसारी नहीं हो सकता। ऐसी स्थिति में कर्तृत्व-भोक्तृत्वरूप संसारित्व किसका कहा जाय ? ॥ ४४ ॥ अविद्यामात्र एवातः संसारोऽस्त्वविवेकतः । कूटस्थेनात्मना नित्यमात्मवानात्मनोव सः ॥४५॥ अविद्येति—इसलिए केवल अविद्यामात्र (भ्रान्तिमात्र) ही संसार है। आत्मस्वरूप का विवेक न होने के कारण वह अविद्या, कूटस्थ आत्मा की सत्ता से स्वयं अपने को ही सत्तावान् समझती रहती है, और यह समझती हुई ही वह सर्वदा आत्मा में (उसके धर्मरूप में) अवभासित होती है। अर्थात् यह अविद्यारूप संसार, आत्मा में अवभासित होता रहता है ॥ ४५ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि संसार और मोक्ष का कोई आश्रय ही नहीं बन सकता तो वास्तविक संसार और मोक्ष किसी के लिये भी नहीं है, ऐसा क्यों न कहा जाय ? इस आशंका का समाधान यह है कि अविद्यामात्र ही संसार है, वह स्वप्न के समान भ्रान्तिमात्र है। आत्मस्वरूप का ज्ञान न होने के कारण संसार उसमें अध्यस्त होता है। अतः कूटस्थ आत्मा की सत्ता से सत्तावान् होकर सर्वदा आत्मा में उसके धर्मरूप से प्रतिभासित होता है। संसार अवस्तुभूत है तथापि आत्मा में अपरोक्षतया (प्रत्यक्षतया) सत् रूप से भासित होता है, इसप्रकार भासित होने में निमित्त यही है कि वह आत्मा में अध्यस्त है, अतः आत्मा की सत्ता से वह भी सत्तावान्-सा प्रतीत होता है ॥ ४५ ॥ रज्जुसर्पो यथा रज्ज्वा सात्मकः प्राग्विबेकतः । अवस्तुसन्नपि ह्येष कूटस्थेनात्मना तथा ॥४६॥ रज्जुसर्प इति—विवेक के पूर्व रज्जु में प्रतीयमान सर्प, रज्जु की सत्ता से जिस प्रकार सत्तावान् प्रतीत होता है, उसी प्रकार यह संसार (अविद्या) अवस्तुरूप होने पर भी कूटस्थ आत्मा की सत्ता से सत्तावान् प्रतीत होता रहता है ॥ ४६ ॥ हृदयस्पर्शिनी उक्त कथन को दृष्टान्त से स्पष्ट कर रहे हैं। जिस प्रकार विवेक के पूर्व रज्जु में प्रतीत होनेवाला सर्प, रज्जु की सत्ता से सत्तावान् होता है, उसी प्रकार संसार अवस्तुरूप रहने पर भी वह कूटस्थ आत्मा की सत्ता से सत्तावान् प्रतीत होता है ॥ ४६ ॥ आत्माभासाश्रयश्चात्मा प्रत्ययैः स्वैर्विकारवान् । सुखी दुःखी च संसारी नित्य एवेति केचन ॥४७॥