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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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२०० उपदेशसाहस्री आत्मेति—आत्मा ही आत्माभास (जीवत्व) का आश्रय है। वही अपने धर्मभूत प्रत्ययों के कारण विकारवान् (विकारी) तथा सुखी, दुःखी और संसारी प्रतीत होता है। तथापि कोई वादी उसे नित्य ही कहा करते हैं ॥ ४७ ॥ हृदयस्पर्शिनी एक अन्य मत से कल्पनालाघव प्रदर्शित करते हुए शंका करते हैं—आत्मा ही आत्माभास (जीव) का आश्रय है। अतः वही अपने धर्मभूत प्रत्ययों के कारण विकारी तथा सुखी, दुःखी और संसारी होता है। तथापि कतिपय वादीगण उसे 'नित्य ही' कहते हैं। क्योंकि तरंगादिकों से समुद्र के विकारी होने पर भी उसमें स्थैर्य (स्थिरता) दृष्टिगत होती ही है। अतः आभास और तदाश्रयात्मना भेदकल्पना करने में गौरव होता है। इसलिये आत्मा ही संसारी है, यह कल्पना क्षुद्र होगी, ऐसा कुछ लोगों का कथन है ॥ ४७ ॥ आत्माभासापरिज्ञानाद्याथात्म्येन विमोहिताः । अहंकर्तारमात्मेति मन्यन्ते ते निरागमाः ॥४८॥ आत्मेति—आत्मा और आत्माभास का ठीक-ठीक ज्ञान न होने से जो लोग मोह से ग्रस्त रहते हैं, तथा अहङ्कार को ही आत्मा मानते हैं, वे लोग शास्त्रबाह्य हैं अर्थात् उन्हें शास्त्र के रहस्य का ज्ञान नहीं है ॥ ४८ ॥ हृदयस्पर्शिनी इसी प्रकरण के 'संभाव्यो गोचरे शब्दः' (१८।२४ वें) श्लोक से यह बताया था कि आत्मा को संसारी कहने में कोई प्रमाण नहीं है, उसे नहीं भूलना चाहिये। अतः एकदेशियों की कल्पना केवल उत्प्रेक्षामूलक ही है, प्रमाणमूलक नहीं है। जो लोग आत्मा और आत्माभास का यथार्थ ज्ञान न होने के कारण मोहग्रस्त हो रहे हैं और अहंकार को ही आत्मा समझ रहे हैं, वे शास्त्रबाह्य हैं, अर्थात् आगमरहस्यपरिचयशून्य हैं। “निष्कलं निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम्१”, “साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च२”, “कृत्स्नः प्रज्ञानघन एव३, “अत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिः४”, इत्यादि नित्यशुद्धत्वादिपरक श्रुतिसंदर्भ को तथा “अनीशया शोचति मुह्यमानः५”, “अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः६”, “अनृतेन हि प्रत्यूढाः७” इत्यादि श्रुतिसन्दर्भ को जिन लोगों नहीं देखा है, वे आत्मा और आत्माभास में विवेक न कर पाने के कारण, अविद्या से संसारी प्रतीत होनेवाले अहंकार को ही अपनी कल्पना से आत्मा समझते हैं ॥ ४८ ॥ संसारो वस्तुसंस्तेषां कर्तृत्वभोक्तृत्वलक्षणः । आत्माभासाश्रयाज्ञानात् संसरन्त्यविवेकतः ॥४९॥ संसार इति—उनकी दृष्टि में कर्तृत्व-भोक्तृत्वरूप संसार भी वस्तुतः सत् है। तथा आत्मा और आत्माभास तथा आभास का आश्रय इनका ज्ञान न रहने से अविवेक के कारण वे जन्म-मृत्युरूप संसार को प्राप्त होते रहते हैं ॥ ४९ ॥ हृदयस्पर्शिनी उन मोहग्रस्त लोगों के मत में कर्तृत्व-भोक्तृत्वरूप संसार भी परमार्थतः सत् है, तथा च “नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः८” इस स्मृति के अनुसार संसार अविनाशी है, अतः उनके मत में मोक्ष की असिद्धि है। १. (श्वे. उ. ६।१९) २. (श्वे. उ. ६।११) ३. (बृ. उ. ४।५।१३) ४. (बृ. उ. ४।३।९) ५. (मुं. उ. ३।१।२, श्वे. उ. ४।७) ६. (मुं. उ. १।२।८, कठ. उ. २।५) ७. (छां. उ. ८।३।२) ८. (भ. गी. २।१६)

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