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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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तत्त्वमसिप्रकरणम् २०९ यदि मोक्ष की अप्राप्ति के भय से संसार को वे भी अवस्तुरूप कहें तो हमारे मत को ही उन्होंने मान लिया, यही कहना होगा। किन्तु मोहग्रस्त होने के कारण आत्मा, आभास और आभास के आश्रय का ज्ञान न होने के कारण वे अविवेक के अधीन होकर जन्म-मृत्यु रूप संसार को प्राप्त होते रहते हैं ॥ ४९ ॥ चैतन्याभासता बुद्धेरात्मनस्तत्स्वरूपता । स्याच्चेत्तं ज्ञानशब्दैश्च वेदः शास्तीति युज्यते ॥५०॥ चैतन्येति—बुद्धि में चैतन्य का आभास और आत्मा का चित्स्वरूपत्व माना जाता है। चैतन्य तो आत्मा का स्वरूप है, धर्म नहीं है। अचेतन बुद्धि में आत्मा का प्रतिबिम्ब पड़ने से वह चैतन्यधर्मवती प्रतीत होती है। इसलिए यह उचित ही कहा जाता है कि वेद ज्ञानमय शब्दों के द्वारा उसका (आत्मा का) उपदेश करते हैं। केवल आत्मा अथवा बुद्धि में शब्द की प्रवृत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि आत्मा निर्धर्मक है और बुद्धि जड़ है। अतः बुद्धि में आत्मा का आभास माना जाता है। अतः चिदाभासविशिष्ट बुद्धि ही वेद के उपदेश को ग्रहण करती है। उसी के द्वारा लक्षणा से वेद आत्मा का बोध कराते हैं ॥ ५० ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्व श्लोक के द्वारा यह बताया गया कि आत्मा, आभास, और आश्रय इनका विवेक न होने से बन्ध होता है और उनका विवेक होनेपर मोक्ष होता है। अब यह बता रहे हैं कि आभास का स्वीकार करने पर एक अन्य लाभ होगा : 'चैतन्य' आत्मा का धर्म नहीं है, वह तो उसका स्वरूप ही है। किन्तु 'बुद्धि' जड़ है। उसमें आत्मा का प्रतिबिम्ब पड़ने से वह चैतन्यधर्मवती अवगत होती है। यदि बुद्धि में आत्मा का आभास न स्वीकार किया जाय, तो केवल आत्मा या बुद्धि में शब्द की प्रवृत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि 'आत्मा' निर्धर्मक और 'बुद्धि' जड़ है। अतः चिदाभासविशिष्ट बुद्धि ही वेद के उपदेश को ग्रहण करती है। और उसी के द्वारा लक्षणा से वेदवाक्य, आत्मा का ज्ञान कराता है। अतः आभास का अपलाप नहीं किया जा सकता । इस कारण बुद्धि (अन्तःकरण) की चैतन्याभास्यता और आत्मा की चैतन्यस्वरूपता मानने पर ही वेद, आत्मा को ज्ञान, सत्य, अनन्त, आनन्द आदि शब्दों से बता पाता है । प्रकाशस्वभाव वस्तु जहाँ प्रतिबिम्बित होती है, वहाँ उसके प्रतिबिम्बित होने में प्रकाशाभासोदय ही हेतु होता है। जैसे जल में प्रतिबिम्बित सविता, उसी तरह बुद्धि में जब चैतन्य प्रतिबिम्बित होता है, तब उसमें चित्प्रकाशोदय ही हेतु होता है । तभी तो साभास बुद्धि में गृहीत सम्बन्ध के कारण ज्ञानादि शब्दों के द्वारा वेद, आत्मा को लक्षणा की सहायता से बोधन कर पाता है, अन्यथा निर्धर्मक आत्मा में शब्दप्रवृत्ति हो ही नहीं पायेगी, तब वह वेदान्तवेद्य भी कैसे कहा जायगा ? अन्य कोई प्रमाण भी उसे नहीं बता पाता, उस स्थिति में आत्मा का अस्तित्व ही सिद्ध नहीं हो सकेगा। अतः आभास को स्वीकार करना ही होगा ॥ ५० ॥ प्रकृतिप्रत्ययार्थौ यौ भिन्नावेकाश्रयौ यथा । करोति गच्छतीत्यादौ दृष्टौ लोकप्रसिद्धितः ॥५१॥ प्रकृतीति—प्रकृति और प्रत्यय के अर्थ भिन्न-भिन्न होने पर भी उनका आश्रय एक ही रहता है, उसी प्रकार लोकप्रसिद्धि के अनुसार करोति, गच्छति इत्यादि में भी भिन्न-भिन्न अर्थ हैं, किन्तु उनका आश्रय एक ही है ॥ ५१ ॥ हृदयस्पर्शिनी आभास के स्वीकार करने पर यद्यपि आत्मा में वेद की प्रवृत्ति का होना उपपन्न हो जाता है, तथापि उसमें 'जानाति' आदि शब्दों की प्रवृत्ति न हो पायेगी, तब व्यवहार ही नहीं चल सकेगा । अथवा 'ज्ञान' शब्द की व्युत्पत्ति करने पर आत्मा में उसकी मुख्यवृत्तिता तो संभव हो ही जाती है, अतः उसे साभास बुद्धिवाचक बताकर आत्मा में लक्षणा से उसकी वृत्ति की कल्पना क्यों की जा रही है ? ऐसी शंका उपस्थित कर, उसका समाधान दे रहे हैं। जैसे—'देवदत्तो गच्छति' इस वाक्य के 'गच्छति' पद में दो अंश हैं, एक 'गम्' और दूसरा 'ति' । इनमें 'गम्' धातु प्रकृति है, उसका अर्थ गमन क्रिया है। तथा 'ति' प्रत्यय कर्तृत्व को सूचित करता है। इस प्रकार प्रकृति और प्रत्यय का अर्थ भिन्न रहने पर भी उन दोनों का आश्रय एकमात्र देवदत्त है । इसी प्रकार 'जानाति' 'करोति' आदि में भी एकमात्र 'आत्मा' को ही आश्रय समझना चाहिये ॥ ५१ ॥ २६