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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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Page 230

२०४ उपदेशसाहस्री न येषामेक एवात्मा निर्दुःखोऽविक्रियः सदा । तेषां स्याच्छब्दवाच्यत्वं ज्ञेयत्वं चात्मनः सदा ॥५७॥ नेति—जिनके मत में 'आत्मा' एक है, सर्वदा ही निर्दुःख और निर्विकार है, उनके अनुसार आत्मा का शब्दवाच्यत्व और ज्ञेयत्व होना कदापि सम्भव नहीं है ॥ ५७ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार मुख्यवृत्ति से 'आत्मा' जानादि शब्दों का वाच्य नहीं है, यह कहने पर यदि कहें कि यह तो तुम्हारे मत में भी होगा, तो उसका इष्टापत्ति के द्वारा परिहार करते हैं। जिनके मत में सर्वदा एक ही निर्दुःख और निर्विकार आत्मा है, उनके सिद्धान्त के अनुसार आत्मा का शब्दवाच्य होना और ज्ञेय होना कभी संभव नहीं है। अथवा आत्मा में बताये गये मुख्य शब्दप्रवृत्ति के अभाव को ही व्यतिरेक के द्वारा बता रहे हैं—जिनके मत में एक ही अर्थात् यथानिर्दिष्ट आत्मा नहीं है, उनके मत में वह शब्द से वाच्य और ज्ञेय सर्वदा हो सकता है। क्योंकि वहाँ कर्त्रादि व्युत्पत्तियों का संभव है। किन्तु श्रौत एकात्मवाद में उसका संभव नहीं है ॥ ५७ ॥ यदाऽहंकर्तुरात्मत्वं तदा शब्दार्थमुख्यता । नाशनायादिमत्त्वात्तु श्रुतौ तस्यात्मतेष्यते ॥५८॥ यदेति—जब अहङ्कार को 'आत्मा' माना जाय, तभी शब्दार्थ की मुख्यता हो सकती है। किन्तु वह भूख- प्यास से युक्त है। इसलिए श्रुति के द्वारा उसका आत्मत्व नहीं माना जाता ॥ ५८ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि कहें कि शब्दार्थ की मुख्यता के लिये आत्मा को सविकार ही मान लिया जाय, इस आशंका का उत्तर दे रहे हैं कि शब्दार्थ की मुख्यता तो तभी हो सकती है, जब अहंकार को आत्मा माना जाय। वह अहंकार तो क्षुधा-पिपासादि से युक्त है। अतः उसे श्रुति ने 'आत्मा' शब्द से नहीं कहा। 'अहं कर्ता' इस प्रकार अभिमन्यमान आकार को आत्मा कहा ही नहीं जा सकता। क्योंकि श्रुति¹ ने तो उसे अशनाया आदि से परे बताया है। अतः ज्ञान आदि शब्दों की आत्मा में साक्षात् प्रवृत्ति नहीं होती, इसीलिये आभास द्वारा उनकी प्रवृत्ति बताई गई है ॥ ५८ ॥ हन्त तर्हि न मुख्यार्थो नापि गौणः कथंचन । जानातीत्यादिशब्दस्य गतिर्वाच्या तथापि तु ॥५९॥ हन्तेति—हे भगवन् ! तब तो 'जानाति' आदि शब्द का मुख्यार्थ या गौणार्थ कुछ भी सम्भव नहीं है, तथापि उसकी कोई न कोई गति तो बतानी ही होगी ॥ ५९ ॥ हृदयस्पर्शिनी शब्द के मुख्यार्थ के अभाव में गौण अर्थ भी नहीं हो सकेगा। अर्थात् जानाति आदि शब्दों की आत्मा में और अन्यत्र भी मुख्यता यदि संभव नहीं है तो अन्य वृत्ति से भी आत्मा में उसकी प्रवृत्ति अनुपपन्न ही होगी। क्योंकि जो अमुख्य है उसका अन्यत्र उपचार भी संभव नहीं होता है। अतः जानाति आदि शब्द का मुख्यार्थ या गौणार्थ कुछ भी संभव नहीं है, तथापि उसकी कोई गति तो बतानी ही चाहिये ॥ ५९ ॥ शब्दानामयथार्थत्वे वेदस्याप्यप्रमाणता । सा च नेष्टा ततो ग्राह्या गतिरस्य प्रसिद्धितः ॥६०॥ शब्दानामिति—इस प्रकार शब्दों की अयथार्थता स्वीकार करने पर वेद को अप्रामाण्य प्राप्त होगा, किन्तु वह अभीष्ट नहीं है। अतः लोकप्रसिद्धि के माध्यम से ही उनकी गति समझनी चाहिए। अर्थात् लोकव्यवहार में जो शब्द जिस अर्थ में प्रसिद्ध हो, वही उस शब्द का वाच्य समझना चाहिए ॥ ६० ॥ १. (बृ. उ. ३।५।१)