उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर
Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)
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Read in contextतत्त्वमसिप्रकरणम् २०५ हृदयस्पशिनी यदि जानाति आदि लौकिक शब्दों की कोई गति नहीं बताई जायगी तो केवल लौकिक शब्दों की ही अप्रमाणता नहीं होगी अपितु वेद की भी अप्रमाणता सिद्ध होगी। वैदिक शब्द भी लोकसिद्ध व्युत्पत्ति की ही अपेक्षा रखते हैं। इस प्रकार वेद का अप्रामाण्य तो किसी को अभीष्ट नहीं है। आत्मा के विषय में तो वेद का ही प्रामाण्य सभी को अभीष्ट है। अतः वेदप्रामाण्यांगीकार के लोभ से ही इन लौकिक शब्दों की गति बतानी ही होगी। एवं च लोक- प्रसिद्धि से ही उन शब्दों की गति स्वीकार करनी चाहिये। अर्थात् लोकव्यवहार में जो शब्द जिस अर्थ में प्रसिद्ध है, उसी को उसका अर्थ मानना चाहिये ॥ ६० ॥ प्रसिद्धिमूढलोकस्य यदि ग्राह्या निरात्मता। लोकायतिकसिद्धान्तः *स चानिष्टः प्रसज्यते ॥६१॥ प्रसिद्धिरिति-यदि मूर्ख लोगों को प्रसिद्धि का स्वीकार करते हैं, तो लोकायतिक (नास्तिक) के देहात्मवाद का सिद्धान्त प्रसक्त होगा, जो किसी को अभीष्ट नहीं है ॥ ६१ ॥ हृदयस्पशिनी पूर्वपक्षवादी ने जो ऊपर कहा कि 'जानाति' आदि शब्दों की गति को लोकप्रसिद्धि से ही समझनी चाहिये । किन्तु प्रश्न यह उपस्थित होता है कि लौकिक शब्दों की गति जानने के लिये प्राकृत पुरुषों की प्रसिद्धि का स्वीकार किया जाय, या पाणिनि आदि अभियुक्त (विद्वान्) को प्रसिद्धि को माना जाय ? उनमें प्रथम प्रसिद्धि का खण्डन करते हैं-यदि प्राकृत (मूर्ख) पुरुषों की प्रसिद्धि को मानते हैं तो देहात्मप्रसिद्धि का भी अभ्युपगम हो जाने से नास्तिकों के अनात्मवाद का सिद्धान्त प्रसक्त होता है। किन्तु वह किसी को अभीष्ट नहीं है। क्योंकि अज्ञानी लोग तो देहादि को ही आत्मा मानते हैं ॥ ६१ ॥ अभियुक्तप्रसिद्धिश्चेत्पूर्ववद्दुर्विवेsingle। गतिशून्यं न वेदोऽयं प्रमाणं संवदत्युत ॥६२॥ अभियुक्तति-यदि अभियुक्तों (पण्डितों) के प्रसिद्ध व्यवहार का ग्रहण करते हैं, तो आत्मा और बुद्धि में किसका ज्ञातृत्व है ? यह विवेक करना कठिन है। प्रमाणभूत वेद भी गतिशून्य के समान आत्मा के ज्ञातृत्व का अनुवाद नहीं कर सकता ॥ ६२ ॥ हृदयस्पशिनी द्वितीय पक्ष का अनुवाद करके उसका भी उत्तर दे रहे हैं-यदि पाणिनि आदि विद्वानों की प्रसिद्धि का स्वीकार करते हैं तो पूर्ववत् (आत्मा और बुद्धि इनमें से किसका ज्ञातृत्व है इस बात का) विवेक करना कठिन है, क्योंकि पूर्वोक्त दोषों की प्रसक्ति होगी। यदि कहें कि गतिशून्य के समान आत्मा के ज्ञातृत्व का अनुवाद वेद करेगा, तो वह भी ठीक नहीं है। क्योंकि वेद प्रमाण हैं, अतः प्रमाणभूत वेद आत्मा के ज्ञातृत्व का गतिशून्य के समान अनुवाद नहीं कर सकता ॥ ६२ ॥ †आदर्शमुखसामान्यं मुखस्येष्टं हि मानवैः। मुखस्य प्रतिबिम्बो हि मुखाकारेण दृश्यते ॥६३॥ आदर्श इति-शीशे में प्रतिफलित हुए मुख के साथ अपने ग्रीवास्थ मुख की समानता समझते हैं। मुख के प्रतिबिम्ब को ही अपने मुख के रूप में देखते हैं ॥ ६३ ॥ हृदयस्पशिनी लौकिक 'जानाति' आदि शब्दों की गति लगाने की पद्धति को बता रहे हैं। चिदात्मा में ही 'जानाति' आदि शब्दों का औपाधिक प्रयोग संभव हो सकता है, उसे दृष्टान्त देकर समझाते हैं। लोग दर्पण में प्रतिबिम्बित मुख के साथ ग्रीवास्थ मुखबिम्ब की समानता (एकता) समझते हैं, किन्तु वहाँ मुख का प्रतिबिम्ब ही मुख के रूप में देखा
- सा चानिष्टा० - पाठान्तरम् । † आदर्श० - पाठान्तरम् ।