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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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२०६ उपदेशसाहस्री जाता है। तात्पर्य यह है कि आदर्श में जो मुख का प्रतिबिम्ब देखते हैं, वह औपाधिक है और वह ग्रीवास्थ मुख से सर्वथा भिन्न है। तथापि उससे एकता (समानता) होने के कारण लोगों को 'यह मेरा मुख है' ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती है। उसी प्रकार यद्यपि आत्मा और आत्माभास परस्पर भिन्न हैं, तथापि उनका विवेक न होने के कारण साधारण लोगों को 'आत्माभास' में ही आत्मत्व का भ्रम होता है, जिससे वे लोग आत्मा में उसके कर्तृत्वादि का आरोप करते रहते हैं ॥ ६३ ॥ यत्र यस्यावभासस्तु तयोरेवाविवेकतः । जानातीति क्रियां सर्वो लोको वक्ति स्वभावतः ॥ ६४॥ यत्रेति—जिसमें जिसका अवभास होता है, उन दोनों पदार्थों के अविवेक से ही सब लोग स्वाभाविक रूप से 'जानाति' आदि क्रिया का प्रयोग किया करते हैं ॥ ६४ ॥ हृदयस्पर्शिनी जैसे कल्पित मुख और वास्तविक मुख दोनों के परस्पर अविवेक से 'मलिनं मुखं, अल्पं मुखं, वक्रं मुखं' आदि औपाधिक व्यवहार होते हैं, उसी तरह आत्मा में भी ज्ञातृत्वादि व्यपदेश (व्यवहार) उपाधि-निबन्धन ही है। अर्थात् चिदाभास की उपाधिरूप बुद्धि के कर्तृत्वादि धर्मों का आत्मा में आरोप किया जाता है ॥ ६४ ॥ बुद्धेः कर्तृत्वमध्यक्ष्य जानातीति ज्ञ उच्यते । तथा चैतन्यमध्यक्ष्य ज्ञातृत्वं बुद्धेरिहोच्यते ॥६५॥ बुद्धेरिति—बुद्धि के कर्तृत्व का आत्मा में अध्यास (आरोप) करके ही 'आत्मा जानता है'—यह कहा जाता है, और बुद्धि में चैतन्य का अध्यास (आरोप) करके उसका 'ज्ञत्व' (ज्ञानवत्त्व) कहा जाता है ॥ ६५ ॥ हृदयस्पर्शिनी अवभास, आभास, प्रतिबिम्बभाव ये सभी समानार्थक हैं। इनके द्वारा आत्मा-अनात्मा के अन्योन्य धर्माध्यास से 'जानाति' आदि शब्दों का व्यवहार होता रहता है। बुद्धि और आत्मा का परस्पर तादात्म्याध्यास होने पर अन्योन्य धर्मों का संकर होने से 'आत्मा जानाति', 'अहं जानामि' आदि व्यवहार होते हैं। आत्मा तो चेतन है और बुद्धि जड़ है। आत्मा में जड़ बुद्धि के कर्तृत्वादि धर्म का आरोप करके उसे 'जानाति' शब्द द्वारा 'ज्ञ' कहा जाता है। उसी तरह बुद्धि में आत्मचैतन्य का अध्यास (आरोप) होता है, इस कारण उसे भी 'ज्ञ' कहा जाता है ॥ ६५ ॥ स्वरूपं चात्मनो ज्ञानं नित्यं ज्योतिःश्रुतेर्यतः । न बुद्ध्या क्रियते तस्मान्नात्मनान्येन वा सदा ॥६६॥ स्वरूपमिति—'ज्ञान' आत्मा का स्वरूप है। इसलिये वह नित्य है। क्योंकि श्रुति ने उसे (आत्मा को) स्वयंज्योति कहा है। अतः बुद्धि के द्वारा आत्मा में 'ज्ञान' को उत्पन्न नहीं किया जाता, और उसी तरह आत्माके द्वारा अथवा अन्य किसी इन्द्रिय आदि के द्वारा भी उसको उत्पन्न नहीं किया जाता ॥ ६६ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि कहें कि बुद्धि आदि के द्वारा तो आत्मा में ज्ञान उत्पन्न किया जाता है, तब यह कैसे कह रहे हैं कि आत्मचैतन्य का बुद्धि में आरोप (अध्यास) किया जाता है ? इसका समाधान यह है कि बृहदारण्यक श्रुति १ ने बताया है—'ज्ञान' आत्मा का स्वरूप है। इसी को बताने वाली अन्यान्य श्रुतियाँ २ भी हैं। अतः ज्ञान नित्य है। इससे यह प्रतीत होता है कि बुद्धि के द्वारा ज्ञान उत्पन्न नहीं किया जाता। तथा आत्मा या अन्य किसी चक्षुरादि के द्वारा भी उसकी कभी उत्पत्ति नहीं होती है ॥ ६६ ॥ १. "तद्देवा ज्योतिषां ज्योतिः"—(बृ. उ. ४।४।१६) २. "आत्मैवास्य ज्योतिः"—(बृ. उ. ४।३।६), "अत्रायं पुरुषः स्वयं ज्योतिः"—(बृ. उ. ४।३।९), “साक्षी चेता— (श्वे. उ. ६।११)