उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर
Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)
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Read in contextतत्त्वमसिप्रकरणम् २०७ देहेऽहंप्रत्ययो यद्वज्जानातीति च लौकिकाः। वदन्ति ज्ञानकर्तृत्वं तद्वद्बुद्धेस्तथात्मनः॥६७॥ देह इति—बुद्धि और आत्मा दोनों में दोनों का परस्पर अध्यास होता है, उस कारण ज्ञातृत्वादि व्यवहार होता रहता है। एक दृष्टान्त से यह समझ में आ सकता है—जिस प्रकार प्राकृत पुरुषों को देह (शरीर) में 'अहम्' प्रत्यय होता है, उसके होने से ही वे पुरुष अपने को मोटा, दुबला, गोरा, साँवला, काला, रोगी, स्वस्थ आदि समझते रहते हैं। उसी प्रकार लौकिक पुरुष 'बुद्धि' में आत्मत्व का अध्यास करके 'जानाति' शब्द से बुद्धि में ज्ञानकर्तृत्व का प्रदर्शन करते हैं और बुद्धि के कर्तृत्व का 'आत्मा' में आरोप करके उसे ज्ञानाश्रय कहा करते हैं ॥ ६७ ॥ हृदयस्पर्शिनी बुद्धि और आत्मा के अन्योन्यधर्माध्यास से ही ज्ञातृत्व, कर्तृत्वादि व्यवहार होता है, यह बता चुके हैं। उसी में दृष्टान्त दे रहे हैं—जैसे घट आदि का रूपादिमत्त्वेन व्यवहार होता है, वैसे ही यह देह अहम्प्रत्यय के योग्य न होते हुए भी उसमें चेतना का अध्यास करके साधारण लोग देह में ही अहम्प्रत्यय करते हैं, और उसी के कारण वे अपने को कृश, स्थूल, गौर, श्याम, रोगी, निरोग आदि समझते हैं। उसी प्रकार बुद्धि जड़ होने से उसमें ज्ञातृत्व की योग्यता न रहने पर भी, चिदाभास की व्याप्ति के कारण ज्ञातृत्व का आरोप किया जाता है और 'जानामि' कहकर ज्ञानकर्तृत्व प्रदर्शित करते हैं। उसी प्रकार बुद्धि के कर्तृत्व का आत्मा में आरोप कर आत्मा को भी ज्ञानाश्रय कह देते हैं। वस्तुतः आत्मा तो अविकारी (विकाररहित) है और चित्त (बुद्धि) विकारी (विकार सहित) है, किन्तु साधारण लोगों को उन दोनों में विवेक न हो पाने से वे लोग आत्मा को ही विकारी समझते हैं और कहते भी हैं। तात्पर्य यह है कि शास्त्रसंस्कार से रहित लोग 'देवदत्तो जानाति मनुते' इस प्रकार देह को ही ज्ञाता समझते हैं। वैसे ही बुद्धि में ज्ञानकर्तृत्व (बुद्धि ज्ञान की कर्त्री है, ऐसा) कहते हैं और आत्मा को ज्ञान का आश्रय तथा विकारवान् (विकारी) कहते हैं ॥ ६७ ॥ बौद्धैस्तु प्रत्ययैरेवं क्रियमाणैश्च चिन्निभैः । मोहिताः क्रियते ज्ञानमित्याहुस्तार्किका जनाः ॥६८॥ बौद्धैरिति—चेतन के समान प्रतीत होने वाली बुद्धि से प्रत्यय (वृत्तिविशेष) उत्पन्न होते रहते हैं। उन उत्पद्यमान प्रत्ययों से मोहित हुए तार्किक (नैयायिक) लोग आत्मा से 'ज्ञान' का उत्पन्न होना समझने लगते हैं। आत्मा तो नित्य ज्ञानस्वरूप ही है। चिदाभासविशिष्ट बुद्धि से वृत्तिज्ञानों की उत्पत्ति होती है। किन्तु तार्किक लोग इस रहस्य को नहीं समझ पाते ॥ ६८ ॥ हृदयस्पर्शिनी पुनरपि शंका होती है कि तार्किक लोग ज्ञान की उत्पत्ति और विनाश को देखकर आत्मा के द्वारा ज्ञान का किया जाना (उत्पन्न होना) बताते हैं, तब ज्ञान को नित्य समझकर उसे आत्मस्वरूप कैसे कहा जाय ? समाधान यह है कि चेतन के तुल्य प्रतीयमान बुद्धि के उत्पद्यमान प्रत्ययों से मोहित हुए तार्किक लोग 'ज्ञान उत्पन्न होता है' ऐसा कहते हैं। आत्मा तो नित्यज्ञानस्वरूप है। जब बुद्धि में आत्मा का प्रकाश पड़ता है, तब वह चेतन के समान प्रतीत होने लगती है और उसी से घटाकार-पटाकार ज्ञान जैसे वृत्तियों (ज्ञानों) की उत्पत्ति होती रहती है। बुद्धि और आत्मा के परस्पराध्यास से ही यह सब खेल होता है। किन्तु तार्किक लोग (नैयायिक गण) ऐसा न मानकर उस वृत्तिज्ञान को आत्मकतृत्व ही समझते हैं। वे यह नहीं सोच पाते कि यदि आत्मा में कर्तृत्वादि विकार माना जायगा तो आत्मा को अनित्य कहना पड़ेगा। अतः इन तार्किकों को अध्यास से मोहित हुए ही समझना चाहिये। कर्तृत्वादि धर्म तो चिदाभासविशिष्ट बुद्धि के ही हैं। जिस प्रकार एक ही अखण्ड आकाश घटादि से नाना प्रतीत होता है, उसी प्रकार बुद्धिरूप उपाधि के कारण (अनेकविध वृत्तिज्ञान के कारण) एक ही नित्यज्ञानस्वरूप आत्मा विभिन्न-सा जान पड़ता है ॥ ६८ ॥