उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर
Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)
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Read in context( viii ) प्रकाशन के प्रेरक अनन्तश्रीसमलंकृत दक्षिणामूर्तिपीठाधिप श्रीमत्स्वामी महेशानन्द गिरि जी महाराज एक सत्पुरुष होने के नाते स्वयं ही धन्य हैं। उनकी दिनचर्या एवं व्यक्तित्व को देखकर यह अनुभव हो जाता है कि उन्होंने अपने जीवन को आचार्यचरणों के उपदेशानुसार कृतार्थ कर लिया है। अतः उनके विषय में कुछ कहना सूर्य को दीपक दिखाने के समान ही होगा, इसलिये सूर्य को अर्घ्य प्रदान करने के समान हम उनके चरणों में अपना प्रणामार्घ्य प्रदान करते हैं। इस ग्रंथ के मुद्रण के समय इसे शीघ्रातिशीघ्र ग्रंथ का आकार प्रदान करने के लिये पुनः पुनः प्रूफ-संशोधन, अर्थानुसन्धानपूर्वक शुद्धाशुद्धि का निर्णय आदि परिश्रम का कार्य श्री स्वामी निश्चलानन्द सरस्वती जी ने बड़े ही मनोयोग के साथ किया है। ऐसे यति को धन्यवाद ज्ञापन कैसे करें, वे तो प्रणाम और अभिनन्दन के ही पात्र हैं। तारा प्रिंटिंग वर्क्स के श्री पण्ड्या पिता-पुत्र के सहयोग से ही ग्रंथ का मुद्रणकार्य समयानुसार हो सका, अतः वे धन्यवाद के पात्र हैं। भाषानुवाद एवं विस्तृत व्याख्या के साथ इस ग्रंथ का अध्ययन कर अधिकाधिक लोग लाभान्वित होते रहें, तभी सभी का परिश्रम सार्थक होगा। श्रीमच्छङ्करभगवत्पादैर्मथितः सरित्पतिर्वेदः । तत उद्गता च सहसा साहस्त्री समुपदेशानाम् ॥ सततं चिन्तनमस्याः संसृतिबन्धाद्विमोचकं नूनम् । भवदुःखपीडितानां सत्यं सत्यं विजानीयात् ॥ भवदीय गजाननशास्त्री मुसलगांवकर