उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर
Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)
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Read in contextश्रीशङ्करभगवत्-पादाचार्यविरचिता उपदेशसाहस्री उपोद्घातप्रकरणम् चैतन्यं सर्वगं सर्वं सर्वभूतगुहाशयम् । यत्सर्वविषयातीतं तस्मै सर्वविदे नमः ॥ १ ॥ चैतन्यमिति—जो चैतन्य आकाश के समान सर्वत्र व्याप्त और नित्य है¹, तथा जो समस्त प्रपञ्च का उपादान- कारण होने से सर्वस्वरूप है² और स्थावर जङ्गमादि सकल प्राणियों की बुद्धि में अन्तःसाक्षी होता हुआ निर्विकाररूप में स्थित रहता है³, एवं अविद्या और उसके कार्यों से परे है⁴, तथा त्रैकालिक जगत् को सूर्य के समान अपनी सत्तामात्र से प्रकाशित करता है, उस चित्स्वरूप⁵ (ज्ञानस्वरूप) चैतन्य (ब्रह्म) के लिये (मेरा) प्रणाम है ॥ १ ॥ हृदयस्पर्शिनी 'यः सर्वज्ञः सर्ववित्'⁶—'जो सर्वज्ञ है और सर्ववित् है'—इस श्रुति, तथा 'सर्वं वेत्तीति सर्ववित्'—जो सब जानता है उसे 'सर्ववित्' कहा जाता है—इस व्युत्पत्ति के बलपर वह सर्वप्रसिद्ध सर्ववित् ब्रह्म है । उसके लिये वाणी, मन तथा शरीर से हम प्रणाम करते हैं । ग्रन्थ के प्रारम्भ में मङ्गलाचरण करना भारतीय शिष्टों की परम्परा है । मंगलाचरण करने से ग्रन्थ की निर्विघ्न परिसमाप्ति होती है, तथा उसके प्रचार-प्रसारात्मक दृष्टफल की प्राप्ति के साथ ही अदृष्टफल (पुण्य) की भी प्राप्ति होती है । अतः अपनी भारतीय-परम्परा के अनुसार प्रस्तुत ग्रन्थ के रचयिता भगवत् पूज्यपाद् शंकर स्वामिचरण भी प्रस्तुत ग्रन्थ के आरम्भ में प्रथम पद्य (श्लोक) के द्वारा अपने विशिष्ट इष्टदेवता (ब्रह्म) का स्मरण करते हुए नमस्कार (अभिवादन) के रूप में मंगल कर रहे हैं । 'एका क्रिया द्व्यर्थकरी प्रसिद्धा' इस अभियुक्तोक्ति के अनुसार जिज्ञासुजनों को, प्रस्तुत ग्रन्थ की ओर प्रवृत्त कराने के लिये, इसी मंगलाचरण रूप पद्य के द्वारा अनुबन्धचतुष्टय की भी सूचना दे रहे हैं । भगवत्पूज्यपाद आचार्य शंकरस्वामिचरण के द्वारा विरचित—ब्रह्मसूत्रभाष्य के जो अनुबन्धचतुष्टय हैं, वे ही इस ग्रन्थ के भी हैं, क्योंकि उसी का यह 'प्रकरणग्रन्थ' है । ब्रह्म में केवल तटस्थकारणता की शंका करनेवाले वैशेषिकों, नैयायिकों, पाशुपतों आदि को उत्तर देने के लिए उपर्युक्त पद्य में "चैतन्यम्" कहा गया है । चेतन ही चैतन्य है । 'चैतन्य' चेतन से भिन्न नहीं है । वह कूटस्थ ज्ञप्तिरूप है । १. 'नित्यं विभुं सर्वगतम्'—[मुं० उ० १-१-६] । २. 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म'—[छां० उ० ३-१४-१], तथा 'इदं सर्वं यदयमात्मा'—[बृ० उ० २-४-६, ४-५-७], तथा 'आत्मैवेदं सर्वम्'—[छां० उ० ७-२५-२] । ३. 'यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन्'—[तै० उ० २-१], तथा 'हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुषः स वा एष आत्मा हृदि तस्यैतदेव निरुक्तं हृदयम्'—[छां० उ० ८-३-३] । ४. 'नेति नेति'—[बृ० उ० २-३-६], तथा 'नेह नानास्ति किञ्चन'—[बृ० उ० ४-४-१९], तथा 'यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह'—[तै० उ० २-४] । ५. 'विज्ञानमानन्दम्ब्रह्म'—[बृ० उ० ३-९-२८], तथा 'सत्यं ज्ञानमनन्तम्ब्रह्म'—[तै० उ० २-१] । ६. [मुं०—१-९] ।