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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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तत्त्वमसिप्रकरणम् २३९ किन्तु वह आत्मा नित्यसिद्धप्रकाशस्वरूप होने से उसे अपने में अध्यस्त (आरोपित) समस्त विषयों का युगपत् अवभासन होता है, इसलिये उसके परिणामी होने की शंका ही नहीं की जा सकती ॥ १५८ ॥ अध्यक्षोऽहमिति ज्ञानं बुद्धेरेव विनिश्चयः । *नाध्यक्षस्याविशेषत्वान्न तस्यास्ति परो यतः ॥१५९॥ अध्यक्षेति—'मैं साक्षी हूँ' यह ज्ञान, चिदाभासविशिष्ट बुद्धि का ही निश्चय है, 'साक्षी' का नहीं। क्योंकि वह 'निर्विशेष' है, और उससे भिन्न उसका कोई 'द्रष्टा' भी नहीं है ॥ १५९ ॥ हृदयस्पर्शिनी यद्यपि उक्त रीति से आत्मा का भोग्यविषय के आकार में कोई परिणाम न हो, तथापि ब्रह्मज्ञान के आकार में तो परिणाम होता ही है। क्योंकि ब्रह्म यद्यपि स्वात्मा के रूप में ही है, तथापि उसके आकार का अवभास होने में आगन्तुक ज्ञान की अपेक्षा होती है। अतः ब्रह्म को परिणामी कह सकते हैं। इस आशंका का समाधान इस प्रकार किया जाता है कि 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यों से अनुभव में आने वाला 'मैं ब्रह्म (परमात्मा) ही हूँ', इत्याकारक जो ज्ञान है, वह अध्यक्ष (साक्षी) का परिणाम नहीं है। क्योंकि आत्मा तो विशेषरहित है, क्योंकि निरवयव, असंग आत्मा में स्वतः अथवा परतः किसी भी प्रकार का कोई विशेष होने की संभावना ही नहीं है। अपितु साभास बुद्धि की ही निश्चयात्मिका विशेष अवस्था हुआ करती है। 'मैं साक्षी हूँ' यह ज्ञान चिदाभासविशिष्ट बुद्धि का ही निश्चय है, साक्षी का नहीं। क्योंकि वह निर्विशेष है। उससे भिन्न उसका कोई द्रष्टा भी नहीं है। निष्कर्ष यह है कि अनेक जन्मानुष्ठित यज्ञ-यागादि से उत्पन्न अदृष्टादि दोषों की निवृत्ति के संस्कार से युक्त हुई, सगुणब्रह्मोपासना के द्वारा जिसकी चञ्चलता का निराभरण हो चुका है, सम्प्रति विवेक-वैराग्य-शमादि गुणों से सुसंस्कृत हुई और 'तत्' और 'त्वम्' इन दो पदार्थों के परिशोधन से उत्पन्न हुए ज्ञान के कारण जिसमें ब्रह्मात्मैक्य के संस्कार सुदृढ़ हो गये हैं, ऐसी जो ब्रह्मात्मनिश्चयात्मिका बुद्धि है, उसी की कोई अखण्डाकारा अवस्था हुआ करती है, जो 'तत्त्वमसि' वाक्योपदेशश्रवण के समानान्तर शोधित तत्-त्वम् पदार्थ में परिकल्पित भेद का तिरोधान कर देती है। तब अखण्डा- कार अवस्था हो जाती है, उस अवस्था में प्रतिबिम्बित चिदात्मा, उस अखण्डाकार वृत्ति से अपने को अविविक्त समझता हुआ 'अहं'=मैं, इस प्रकार से परामर्श करने लगता है। तब उपाध्यंश का अपोह होने से अपने विविक्ताकार स्वरूप को ही अर्थात् ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है। उसमें कोई किसी प्रकार की नवीन विशेषता पैदा नहीं होती। उस चिदात्मा में किसी प्रकार की कोई विशेषता (परिणाम) मानने पर, परिणामी चित्त के समान 'स्वान्यवेद्यत्व' नियम के अनुसार चिदात्मा का भी कोई अन्य साक्षी मानना होगा। किन्तु अनवस्था और प्रमाणरहित कल्पना करना उचित नहीं है। अतः यही स्वीकार करना होगा कि उसका कोई साक्षी नहीं है ॥ १५९ ॥ कर्त्ता चेदहमित्येवमनुभूयेत मुक्तता । सुखदुःखविनिर्मोको नाहंकर्तरि युज्यते ॥१६०॥ कर्तेति—यदि 'कर्ता'—मैं मुक्त हूँ— ऐसा मानकर 'मुक्तता' का अनुभव कर सकता है तो अहंकारातीत आत्मा में 'सुख-दुःख' की निवृत्ति नहीं रहनी चाहिये थी, किन्तु सुख-दुःख रूप फल की प्राप्ति तो आत्मा को ही हुआ करती है। वह क्यों होती है ? क्योंकि मुक्त होने पर तो 'क्रिया' के सहित 'कर्ता' भी नहीं रहता, इसलिये उसे उसके फल की प्राप्ति नहीं हो सकती ॥ ॥ १६० ॥ हृदयस्पर्शिनी यद्यपि अन्तःकरणका ही ज्ञानाकार (वृत्त्याकार) परिणाम होता है, तथापि उसे उसके सुख-दुःख- निवृत्तिरूप फल की प्राप्ति नहीं होती, वह फलप्राप्ति तो आत्मा को ही हुआ करती है। किन्तु अहंकर्ता के साथ फल का संबंध मानने पर दोष बताते हैं। कर्ता अर्थात् विकारी, 'अहं मुक्तः' मैं मुक्त हूँ—इस प्रकार मुक्तता का अनुभव यदि करे तो निरहंकार आत्मा में सुख-दुःख की निवृत्ति नहीं रहनी चाहिये थी। क्योंकि मुक्त होने पर तो

  • नाध्यक्षस्या०—पाठान्तरम्।