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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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२४० उपदेशसाहस्री क्रिया के सहित कर्ता भी नहीं रहता । इस कारण उसे फल की प्राप्ति कैसे हो सकेगी ? अतः आत्मा के साथ फल का कोई सम्बन्ध नहीं है ॥ १६० ॥ देहादावभिमानोत्थो दुःखीति प्रत्ययो ध्रुवम् । कुण्डलीप्रत्ययो यद्वत्प्रत्यगात्माभिमानिना ॥१६१॥ देहादाविति–'प्रत्यगात्मा' में अभिमान करने वाले व्यक्ति का जैसे 'मैं कुण्डल वाला हूँ'—यह प्रत्यय निवृत्त ( बाधित ) हो जाता है, क्योंकि कुण्डल का सम्बन्ध तो स्थूल शरीर से है। उससे अपना पार्थक्य ज्ञान ( भिन्नता का ज्ञान ) हो जाता है, तब वह अपने से उसका सम्बन्ध नहीं मानता। उसी प्रकार 'विवेक ज्ञान' के द्वारा उसका 'मैं दुःखी हूँ'—यह देहाभिमान से उत्पन्न हुआ अविवेकमय प्रत्यय भी निश्चित रूप से बाधित हो जाता है ॥ १६१ ॥ हृदयस्पर्शिनी प्रत्यगात्मा में अभिमान रखने वाले पुरुष का 'मैं कुण्डलवाला हूँ'—यह प्रत्यय बाधित हो जाता है, क्योंकि कुण्डल का सम्बन्ध तो स्थूल शरीर से ही रहता है। जब स्थूल शरीर से अपने को भिन्न समझने लगता है, तब वह उसे अपने से सम्बन्धित नहीं मानता। उसी प्रकार जब विवेकज्ञान हो जाता है तब 'मैं दुःखी हूँ'—यह देहाभिमान से उत्पन्न हुआ अविवेकमय प्रत्यय भी निश्चितरूप से बाधित हो जाता है ॥ १६१ ॥ बाध्यते प्रत्ययेनेह विवेकेनाऽविवेकवान् । विपर्यासेऽसदन्तं स्यात्प्रमाणस्याप्रमाणतः ॥१६२॥ बाध्यते इति—अविवेक से विवेक का बाध क्यों नहीं होता ? इस शंका का समाधान यह है कि विपर्यास मानने पर प्रमाण का अप्रामाण्य हो जाने के कारण सभी कुछ 'शून्यमय' हो जायगा। अतः 'अविवेक' से 'विवेक' की निवृत्ति नहीं हुआ करती ॥ १६२ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि विवेकज्ञान से अविवेक की निवृत्ति हो जाती है, तो अविवेक के द्वारा विवेक की भी निवृत्ति हो सकती है। इस प्रकार शंका करने पर समाधान देते हैं कि इस प्रकार विपरीत मानने पर प्रमाण का अप्रामाण्य हो जायगा, तब सभी शून्यमय हो जायगा। अतः अविवेक से विवेक की निवृत्ति मानना उचित नहीं है ॥ १६२ ॥ दाहच्छेदविनाशेषु दुःखित्वं नान्यथाऽऽत्मनः । नैव ह्यन्यस्य दाहादावन्यो दुःखी भवेत्क्वचित् ॥१६३॥ दाहेति–देहाभिमान के रहने से अनुभूयमान दाह, छेदन और मरण होने के लिये अविवेक के अतिरिक्त अन्य कोई कारण नहीं। अतः 'आत्मा' का दुःखी होना सम्भव नहीं है। क्योंकि अन्य के दाहादि में कोई अन्य कभी दुःखी नहीं होता है ॥ १६३ ॥ हृदयस्पर्शिनी विवेक से अविवेक की निवृत्ति (बाध) होती है, यह पहले बता चुके हैं, उसे और अधिक स्पष्ट कर रहे हैं। दुःख का जो अनुभव होता है, वह दाहादि देहोपघात के कारण ही होता है, अन्यथा नहीं। वह अनुभव देहाभिमाननिबन्धन ही है, अन्यथा सुषुप्ति में भी होना चाहिये। अतः देहाभिमान के कारण अनुभूयमान दाह, छेदन, मरण आदि से होनेवाले दुःखानुभव में अविवेक के अतिरिक्त और कोई कारण नहीं है। इसीलिये आत्मा का दुःखी होना असंभव ही है। क्योंकि किसी दूसरे के दाहादि होने पर कोई अन्य कभी दुःखी नहीं होता अर्थात् 'अहं दुःखी अस्मि' मैं दुःखी हूँ—ऐसा ज्ञान नहीं हुआ करता। आत्मा भी देह से भिन्न है, यह प्रमाणसिद्ध है। 'अहं दुःखी अस्मि' यह जो अनुभव होता है, वह अध्यासनिबन्धन है ॥ १६३ ॥