BharatKosha
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

Page 286 of 364

Read in context
Page 286

तृष्णाज्वरनाशकप्रकरणम् प्रयुज्य तृष्णाज्वरनाशकारणं चिकित्सितं ज्ञानविरागभेषजम् । न याति कामज्वरसन्निपातजां शरीरमालां शतयोगदुःखिताम् ॥१॥ प्रयुज्येति—तृष्णा रूपी ज्वर को नष्ट करने वाली ज्ञान-वैराग्य रूपी औषधि को जिसमें दिया जाता है, उस चिकित्सा का प्रयोग करने से मनुष्य को यह दुःखमयी शरीर-परम्परा प्राप्त नहीं होती¹, जो काम ज्वर की मूर्छा तथा सैकड़ों विषयों के सम्बन्ध से हुआ करती है ॥ १ ॥ हृदयस्पर्शिनी प्रकरण का नाम उसके प्रतिपाद्य विषय को ध्यान में रखकर दिया गया है । कुछ लोगों ने इस प्रकरण का नाम ‘भेषजप्रयोग प्रकरण' तथा कुछ लोगों ने 'आत्म-मनःसंवाद प्रकरण' भी रखा है। 'तत्' और 'त्वं' पदार्थ का शोधन संक्षिप्त तथा विस्तृत रूप से किया गया; और ब्रह्मात्मैक्यलक्षण वाक्यार्थज्ञान सफल है, समस्त वेदान्त वाक्यों से उसकी प्रतीति होती है, यह प्रमाण और युक्ति से भी बता चुके । नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्त, सत्य, ज्ञान, अनन्त आनन्द स्वरूप प्रत्यगात्मा के सम्बन्ध में भेद-विपर्यासादि अनेक अनर्थों के होते रहने में अहंकार, मन, बुद्धि, एवं चित्त का संघातारूप अन्तःकरण ही हेतुभूत है—यह भी बता चुके हैं। अब हम मुख्यतया यह बता रहे हैं कि आत्मा का संसार मनोऽध्यासमूलक ही होता है, अतः उस मन का स्वरूप और उसकी चेष्टाओं का अनुसन्धान करते हुए उसका विलापन करने में प्रयत्नशील होना चाहिये । इसी अभिप्राय से 'आत्म-मनःसंवादरूप प्रकरण' का प्रारंभ करने की इच्छा से ग्रंथकार प्रथमतः प्रकरण के प्रयोजन को बता रहे हैं—यह मानव प्राणी तृष्णारूपी ज्वर की नाशक ज्ञान-वैराग्यरूपी औषधि का प्रयोग करने से कामज्वरजनित मूर्छा तथा सैकड़ों विषयों के संबंध से प्राप्त होनेवाली दुःखमयी शरीर- परम्परा को प्राप्त नहीं होता है ॥ १ ॥ अहं ममेति त्वमनर्थमीहसे परार्थमिच्छन्ति तवान्य ईहितम् । न तेऽर्थबोधो न हि मेऽस्ति चार्थिता ततश्च युक्तः शम एव ते मनः ॥२॥ अह्मिति—हे मन ! तू 'अहम्-मम'-मैं और मेरा इस आकार से व्यर्थ चेष्टा करता रहता है । सांख्यवादी विद्वान् तेरी चेष्टा को परार्थ (पुरुष के भोगापवर्गार्थ) मानते हैं । तू मुझपर उपकार कर ही कैसे सकता है ? क्योंकि तू अचेतन है, अतः तुझे अर्थज्ञान का होना संभव नहीं है, और मुझमें कोई किसी प्रकार की अर्थिता नहीं है । ऐसी स्थिति में हे मन ! तेरा शान्त रहना ही समुचित है ॥ २ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस औषधिप्रयोग प्रकरण का आत्ममनःसंवाद के रूप में विस्तार करते हुए बता रहे हैं—हे मन ! तू 'मैं, मेरा' इस प्रकार की व्यर्थ चेष्टा कर रहा है । यदि कहो कि मैं तुम्हारे लिये ही चेष्टा कर रहा हूँ, अतः उस चेष्टा को व्यर्थ क्यों कह रहे हो ? अन्य सांख्यवादी लोग तुम्हारी चेष्टा को परार्थ अर्थात् पुरुष के भोग और अपवर्ग के लिये मानते हैं । किन्तु हम वेदान्त सिद्धान्तवादी यह नहीं मानते । तुझे मेरा प्रयोजनीय विषय ही ज्ञात नहीं है, क्योंकि तू अचेतन है, और न मुझे तुझसे कुछ माँगना ही है । ऐसी स्थिति में, रे मन ! तेरा शान्त हो जाना ही उचित है ॥२॥ १. इस १९ वे प्रकरण को 'भेषज प्रकरण' भी कहते हैं, क्योंकि इसमें देहप्राप्ति रूप रोग को नष्ट करने वाली औषधि को बताया जा रहा । उसी तरह यह औषधोपचार, 'आत्म-मनःसंवाद' के रूप में किया जा रहा है, इसलिये इस प्रकरण को 'आत्म-मनःसंवाद' प्रकरण भी कहते हैं ।