उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर
Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)
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Read in contextतृष्णाज्वरनाशकप्रकरणम् २६१ यतो न चान्यः परमात् सनातनात् सदैव तृप्तोऽहमतो न मेऽर्थिता । सदैव तृप्तश्च न कामये हितं यतस्व चेतः प्रशमाय *ते हितम् ॥३॥ यत इति—मैं (प्रत्यगात्मा) सनातन अर्थात् पूर्णानन्दस्वरूप ‘परमात्मा’ से भिन्न नहीं हूँ, और सर्वदा ही तृप्त हूँ हूँ, अतः मुझे किसी भी वस्तु की इच्छा नहीं है। सर्वदा ही तृप्त रहने के कारण स्वयं के लिये किसी प्रकार के हित की भी इच्छा नहीं करता। अतः हे चित्त (मन) ! तू शान्त होने के लिये ही प्रयत्न (चेष्टा) कर, यही तेरे लिये हितकर होगा ॥ ३ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा के अर्थित्वाभाव को सिद्ध कर रहे हैं—मैं (आत्मा) तो सनातन पूर्णानन्दस्वरूप परमात्मा से पृथक् नहीं हूँ, मैं तो सदा-सर्वदा ही तृप्त हूँ। अतः मुझे किसी भी वस्तु की इच्छा नहीं है। मैं सर्वदा तृप्त होने के कारण अपने लिए किसी हित की कामना भी नहीं करता। इसलिए हे मन ! तू शान्त हो जाने का प्रयत्न कर। यही तेरे हित में होगा ॥ ३ ॥ षडूर्मिमालाभ्यतिवृत्त एव यः स एव चात्मा जगतश्च नः श्रुतेः । प्रमाणतश्चापि मया प्रवेद्यते मुधैव तस्माच्च मनस्तवेहितम् ॥४॥ षडूर्मिमालेति—जो पुरुष 'क्षुधा, पिपासा, शोक, मोह, जरा और मृत्यु'—इन छह ऊर्मिमाला (ऊर्मियों) से पार हो जाता है, वही पुरुष हमारा और जगत् का 'आत्मा' है। उसे हम 'यत्साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म'—इस श्रुति से तथा 'य आत्मा सर्वान्तरः'—इस श्रुति से और 'अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः'—इस स्मृति प्रमाण से भी सम्यक्तया (यथार्थरूप से) समझते हैं। अतः हे मन ! तेरी दौड़-धूप की चेष्टा करना व्यर्थ है ॥ ४ ॥ हृदयस्पर्शिनी परमात्मा से अभिन्न होने के कारण अपने अर्थित्वाभाव को बताया। अब परमात्मा से अपनी अभिन्नता का उपपादन कर रहे हैं—अशनाया (क्षुधा), पिपासा, शोक, मोह, जरा, मृत्यु ये छह ऊर्मियां कहलाती हैं। ये छह ऊर्मियाँ प्राण, मन, और देह की धर्मरूप हैं। ये छहों धर्म, नदी की ऊर्मि (तरंग) की तरह आविर्भाव-तिरोभावरूप हैं। यह आत्मा उक्त छह ऊर्मिमाला अर्थात् ऊर्मिपरम्परा को पार किये हुए है, वही हमारा और जगत् का आत्मा है। अर्थात् वह आत्मा निष्प्रपञ्च है। उसे हम श्रुति¹-स्मृति² के प्रमाणों से अच्छी तरह जानते हैं। अतः हे मन ! तेरी सब चेष्टाएँ व्यर्थ हैं ॥ ४ ॥ त्वयि प्रशान्ते नहि चास्ति भेदधीर्यतो जगन्मोहमुपैति मायया । ग्रहो हि मायाप्रभवस्य कारणं ग्रहाद्विमोके नहि साऽस्ति कस्यचित् ॥५॥ त्वयीति—तू जब शान्त हो जायगा, तब 'भेदबुद्धि' नहीं रह पायेगी। उस भेदबुद्धि से ही यह संसार, 'माया' के अधीन होकर 'मोह' को प्राप्त हो रहा है, क्योंकि 'भेदबुद्धि' से ही 'माया' की उत्पत्ति होती है। उस 'भेदबुद्धि' के निवृत्त होते ही वह 'माया' भी उसके लिये नहीं रह पाती ॥ ५ ॥ हृदयस्पर्शिनी तेरे शान्त हो जाने पर भेदबुद्धि नहीं रहती। भेदबुद्धि से ही यह संसार, माया के कारण मोह को प्राप्त होता है। क्योंकि अकृतार्थताभिमानलक्षणा माया की उत्पत्ति का कारण भेदज्ञान ही है। उस भेदज्ञान के निवृत्त होते ही वह माया भी किसी के लिये नहीं रहती। मन के प्रशांत होने पर वह भेदबुद्धि नहीं रह पाती, क्योंकि सुषुप्ति में मन का अभाव रहता है, तब भेदबुद्धि भी नहीं रहती, यह अन्वय-व्यतिरेक से सिद्ध है। सुषुप्ति में भेद- बुद्धि के न रहने पर माया-मोह भी नहीं रहता ॥ ५ ॥ १. (बृ. उ. ३।४।१) ‘यत्साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म’, ‘य आत्मा सर्वान्तरः’ । २. (भ. गी. १०।२०) ‘अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ॥’
- तेऽधिकम्—पाठान्तरम् ।