उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर
Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)
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Read in context२६२ उपदेशसाहस्री न मेऽस्ति मोहस्तव चेष्टितेन हि प्रबुद्धतत्त्वस्ववसितो ह्यविक्रियः । न पूर्वतत्त्वोत्तरभेदता हि नो वृथैव तस्माच्च मनस्तवेहितम् ॥६॥ नेति—तेरी चेष्टा से मुझ पर मोह का कोई प्रभाव नहीं पड़ पाता क्योंकि मैं 'ज्ञाततत्त्व, बन्धनरहित तथा अविकारी' हूँ, क्योंकि हमारी दृष्टि में तत्त्वज्ञान के पूर्व और उत्तर काल में कोई अन्तर नहीं है। अतः हे मन ! तेरी सम्पूर्ण चेष्टा व्यर्थ ही है ॥ ६ ॥ हृदयस्पर्शिनी अरे मन ! तेरी चेष्टा से मुझे मोह नहीं हो सकता, क्योंकि मैं बन्धरहित, प्रबुद्धतत्त्वस्वरूप, और विकार- शून्य हूँ। मेरी दृष्टि में तत्त्वज्ञान होने के पूर्व और उसके उत्तर काल में कोई भी विशेष (भेद) लक्षित नहीं हो रहा है। इसलिये हे मन ! तेरी चेष्टा व्यर्थ ही है, क्योंकि तुम्हारी चेष्टा से मुझमें कोई अतिशय नहीं हो सकता ॥ ६ ॥ यतश्च नित्योऽहमतो न चान्यथा विकारयोगे हि भवेदनित्यता । सदा प्रभातोऽहमतो हि चाद्वयो विकल्पितं चाप्यसदित्यवस्थितम् ॥७॥ यत इति—'मैं नित्य हूँ', अतः मुझमें 'अनित्यता' नहीं है। 'विकार' का योग होने पर ही वह (अनित्यता) हो पाती है (परन्तु मैं अविकारी होने से नित्य हूँ)। 'मैं सर्वदा प्रकाशस्वरूप हूँ', अतः 'अद्वय' हूँ। जो कुछ 'दृश्य' है, वह सब 'असत्' है। यह बात निश्चित है ॥ ७ ॥ हृदयस्पर्शिनी समस्त दृश्यवर्ग से परे रहनेवाले इस आत्मा में आगन्तुक अतिशय का सम्बन्ध कभी नहीं हो सकता । अन्यथा आत्मा में अनित्यता प्राप्त होगी । अनित्यता की प्राप्ति किस कारण होगी, जो कि उसका निषेध किया जा रहा है ? मैं तो नित्य हूँ, अतः मुझ में अनित्यता नहीं है। अनित्यता तो विकार का संबन्ध होनेपर ही होती है। यदि कहो कि परिस्पन्द-परिणामादिरूप विकार के न रहने पर भी प्रकाशाप्रकाशसंसर्गरूप विकार हो सकता है, तो उसका उत्तर यह है कि मैं सर्वदा ही प्रकाशस्वरूप हूँ। इस विषय में¹ श्रुति प्रमाण है। मैं अद्वय हूँ। यदि कहो कि दृश्यभेद के विद्यमान रहते अद्वय कैसे हो सकते हो ? उत्तर यह है कि आगन्तुक रज्जु-सर्प की तरह जो कुछ भी दृश्य है, वह सब असत् है, इसे निश्चित समझो ॥ ७ ॥ अभावरूपं त्वमसीह हे मनो निरीक्ष्यमाणे न हि युक्तितोऽस्तिता । सतो ह्यनाशादसतोऽप्यजन्मतो द्वयं च चेतस्तव नास्तितेष्यते ॥८॥ अभावरूपमिति—हे मन ! तू अभावरूप है। युक्तिपूर्वक विचार करने पर तेरा 'अस्तित्व' सिद्ध नहीं होता। क्योंकि जो वस्तु 'सत्' होती है, उसका कभी 'नाश' नहीं होता, तथा जो वस्तु 'असत्' होती है, उसकी 'उत्पत्ति' नहीं होती। किन्तु हे चित्त ! तुझमें ये दोनों (उत्पत्ति और नाश) हैं। अतः तेरी परमार्थसत्ता नहीं है। तुझे अभावरूप मानना ही इष्ट है ॥ ८ ॥ हृदयस्पर्शिनी मन के होने से तो आत्मा की सद्वितीयता अवगत हो रही है, अतः उसे अद्वितीय कैसे मान लिया जाय ? रे मन ! तू तो अभावरूप है, युक्तिपूर्वक विचार करने पर तुम्हारा अस्तित्व सिद्ध नहीं होता है। क्योंकि गीता में भगवान कहते हैं²—'सत् वस्तु' का कभी नाश नहीं होता, और 'असत् वस्तु' की कभी उत्पत्ति नहीं होती। रे मन ! तुझ में तो उत्पत्ति और विनाश दोनों हैं। इस कारण तेरी पारमार्थिक (वास्तविक) सत्ता नहीं मानी जा सकती ॥ ८ ॥ १. सकृद्विभातो ह्येवैष ब्रह्मलोकः ।—(छां. उ. ८।४।२) तथा पश्यन्वै तन्न पश्यति ।—(बृ. उ. ४।३।२३) २. "नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।"—(भ. गी. २।१६)