BharatKosha
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

Page 291 of 364

Read in context
Page 291

तृष्णाज्वरनाशकप्रकरणम् २६५ विकल्पना चाप्यभवे न विद्यते सदन्त्यदित्येवमतो न नास्तिता । यतः प्रवृत्ता तव चापि कल्पना पुरा प्रसिद्धेर्न च तद्धि कल्पितम् ॥१३॥ विकल्पनेति—आत्मा 'नित्य' है, उसकी कभी उत्पत्ति नहीं हुआ करती । उस नित्य आत्मा में 'सत्' एवं 'असत्' की कल्पना भी नहीं की जा सकती । इसलिये पूर्व सिद्ध होने के कारण उस रे मन ! आत्मा में तुम्हारी कल्पना की जाने मात्र से उसको ( आत्मा को ) कल्पित नहीं कहा जा सकता ॥ १३ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा तो कल्पना का विषय ही नहीं है। जिसकी कभी उत्पत्ति ही नहीं होती, ऐसे नित्य आत्मा में सत् और असत् की कल्पना भी नहीं है । इसलिये उसका अभाव भी नहीं है। तुम्हारी कल्पना जिससे प्रवृत्त हुई है, वह आत्मा पूर्वसिद्ध होने के कारण उसे कल्पित नहीं कहा जा सकता ॥ १३ ॥ असद्द्वयं तेऽपि हि यद्यदीक्ष्यते न दृष्टमित्येव न चैव नास्तिता । यतः प्रवृत्ता सदसद्विकल्पना विचारवद्वाऽपि तथाऽद्वयं च सत् ॥१४॥ असदिति—हे मन ! तेरे द्वारा जो भी देखा जाता है, वह सभी द्वैत समुदाय 'असत्' ही है। दिखाई नहीं देता, इस कारण किसी पदार्थ का अभाव सिद्ध नहीं होता । विचार का पर्यवसान जैसे निर्णय में होता है, वैसे ही जिससे 'सत्' और 'असत्' की कल्पना प्रवृत्त हुई है, वह 'अद्वय' एवं 'सत्' ही है, वह कल्पना की अधिष्ठानभूत 'वस्तु' है ॥ १४ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस पर पूर्वपक्षवादी कहता है कि जो उपलब्ध होता है उसकी सत्ता मानी जाती है, और जो उपलब्ध नहीं होता उसकी सत्ता नहीं मानी जाती । द्वैत की तो उपलब्धि होती है, अद्वैत की नहीं, तब अद्वैत की सत्ता कैसी मानी जाय ? इस शंका के समाधान में सिद्धान्ती कहता है कि किसी वस्तु की सत्ता या असत्ता में उसका दीखना या न दीखना कारण नहीं है । किन्तु वस्तु की सत्ता या असत्ता में निश्चायक कोई अन्य ही हेतु है। इसलिये रे मन ! तुम्हारे द्वारा जो-जो देखा जाता है, वह द्वैत ही देखा जाता है, वह तो स्वप्नदृष्ट वस्तु की तरह विनष्टस्वरूपवाला होने से असत् ही है । उसी तरह दिखाई नहीं देती, इसलिये वह वस्तु है ही, नहीं ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि नीरूप वायु का चाक्षुष प्रत्यक्ष न होने पर भी उसकी (वायु की) असत्ता नहीं कही जाती । अपितु उसकी सत्ता ही मानी जाती है । वस्तु के विद्यमान रहने पर भी द्रष्टा के असामर्थ्य से, अथवा दर्शनयोग्यता के न रहने से उसका दर्शन होना असंभव हो जाता है । अतः किसी वस्तु के दर्शन या अदर्शन मात्र से उसकी सत्ता या असत्ता का निर्णय नहीं किया जा सकता । जिस प्रकार विचार का पर्यवसान निर्णय में होता है, उसी तरह जिससे सत् और असत् की कल्पना प्रवृत्त हुई है, वह कल्पना की अधिष्ठानभूत वस्तु अद्वय है और वही सत् है ॥ १४ ॥ सदभ्युपेतं भवतोपकल्पितं विचारहेतोर्यदि तस्य नास्तिता । विचारहानाच्च तथैव संस्थितं न चेत्तदिष्टं नितरां सदिष्यते ॥१५॥ सदिति—यदि तुम यह कहते हो कि 'सद्' वस्तु कोई है ही नहीं किन्तु इसका निर्णय करने के लिये तुम्हें विचार करना पड़ता है या नहीं ? यदि तुम्हें विचार करना पड़ता है, तो तुमने 'सत् वस्तु' की सत्ता को स्वीकार कर ही लिया है, यह मानना होगा, क्योंकि विचार करने के लिये किसी आधारभूत पदार्थ की सत्ता को स्वीकार किया जाता है । यदि आधार को स्वीकार न किया जाय तो विचार की प्रवृत्ति ही नहीं होगी। तब 'तत्त्व' का निर्णय ही नहीं हो पायगा । इस प्रकार 'तत्त्व' का अनिर्णय यदि अभीष्ट नहीं है- तो यह निश्चित ही है कि 'सद्वस्तु' तुम्हें स्वीकार्य है ॥ १५ ॥ हृदयस्पर्शिनी विचार करने के लिए वादी और प्रतिवादी को अपने विवाद की आश्रयभूत किसी वस्तु का अवलंब (स्वीकार) करना ही पड़ता है; नहीं तो विवाद हो ही नहीं सकता । जैसे—आत्मा की सगुणता अथवा निर्गुणता का ३४