BharatKosha
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

Page 292 of 364

Read in context
Page 292

२६६ उपदेशसाहस्री निर्णय करना हो तो दोनों पक्षों को धर्मिस्वरूप आत्मा की सत्ता का स्वीकार तो करना ही पड़ेगा, अन्यथा उसके सगुणत्व या निर्गुणत्व धर्म का विचार ही कैसे प्रवृत्त हो सकेगा ? तुम्हारा कहना है कि कोई सत् वस्तु नहीं है, किन्तु उसके निर्णयार्थ तुम्हें विचार करना होगा कि नहीं ? निर्णयार्थ यदि तुम विचार करना आवश्यक समझते हो तो तुमने 'सत्' वस्तु की सत्ता को पहले स्वीकार कर ही लिया। क्योंकि उसके बिना विचार का आरंभ ही नहीं हो सकेगा। यदि उसका अस्तित्व न माना जाय तो विचार की प्रवृत्ति न होने के कारण निर्णय न हो पाने से वह तत्त्व अनिर्णीत ही रह जाता है। यदि ऐसा होना इष्ट नहीं है तो 'सत्' को निश्चित रूप से स्वीकार करना ही होगा ॥ १५ ॥

असत्समं चैव सदित्यपीति चेदनर्थवत्त्वान्नग्शृङ्गतुल्यतः । अनर्थवत्त्वं त्वसति ह्यकारणं न चैव तस्मान्न विपर्ययेऽन्यथा ॥१६॥

असत्सममिति—इस पर पूर्व पक्षी का कहना है कि 'सत्' वस्तु का स्वीकार करनेपर भी वह (सद्वस्तु) अर्थक्रिया- शून्य होने के कारण नरशृङ्ग के समान उसको 'अलीक' ही कहना होगा। तब सिद्धान्ती कहता है कि वस्तु की अर्थक्रिया- शून्यता उसकी 'असत्ता' में कारण नहीं है, तथा अर्थक्रियाकारित्व से 'वस्तु' की 'सत्ता' सिद्ध नहीं हुआ करती। अतः इससे विपरीत अवस्था में 'वस्तु' का अभाव रहना भी संभव नहीं है ॥ १६ ॥

हृदयस्पर्शिनी पूर्वपक्षी बौद्ध का कथन है कि जो वस्तु सत् होती है, वह सक्रिय होने से दीपशिखा के तुल्य क्षणिक होती है। और जो सक्रिय नहीं होती, वह असत् होती है। अतः परमार्थ वस्तु सत् नहीं हो सकती। यदि 'सत्' है ऐसा स्वीकार किया भी जाय तो अर्थक्रियाशून्य होने के कारण नरशृंग के तुल्य होने से वह अलीक (मिथ्या) ही होगी। इसपर सिद्धान्ती का कहना है कि वस्तु की असत्ता में 'अर्थक्रियाशून्यत्व' को कारण नहीं कहा जा सकता। 'अर्थक्रिया- कारित्व' से 'वस्तु की सत्ता' सिद्ध नहीं होती। क्योंकि कण्टकादि के अभाव में भी पादन्यासरूप क्रिया हो सकती है तथा क्रिया की उत्पत्ति से पूर्व भी वस्तु की सत्ता देखी जाती है। अतः अर्थक्रियाकारित्व से रहित होनेपर भी वस्तु 'सत्' हो सकती है। उसका अभाव संभव नहीं है ॥ १६ ॥

असिद्धतश्चापि विचारकारणाद्द्वयं च तस्मात्प्रसृतं च मायया । श्रुतेः स्मृतेश्चापि तथा हि युक्तितः प्रसिद्धयतीत्थं न तु युज्यतेऽन्यथा ॥१७॥

असिद्धतश्चेति—इसके अतिरिक्त तुम्हारे द्वारा किये गये अनुमान— 'श्रोतं सत् असत्समं अर्थक्रियाशून्यत्वात्, नरशृङ्गवत्' में 'असिद्धि' दोष के कारण उक्त हेतु हेत्वाभासरूप है। विचार के कारणभूत 'आत्मा' से ही मायावश 'द्वैत' का विस्तार हुआ है। श्रुति, स्मृति और युक्ति से भी यही सिद्ध हो रहा है। और कोई अन्य प्रकार बताना युक्तिविरुद्ध है ॥ १७ ॥

हृदयस्पर्शिनी इसके पूर्व के श्लोक में व्यभिचार-दोष का प्रदर्शन करते हुए बौद्धमत का खण्डन किया है। अब इस श्लोक में पक्षासिद्धिरूप दोष को बता रहे हैं। तुम्हारा अनुमान असिद्धिदोष से दूषित होने के कारण भी ठीक नहीं है। विचार के हेतुभूत आत्मा से ही मायावश द्वैत का विस्तार हुआ है। क्योंकि "मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्"१ तथा 'मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्'२ इत्यादि श्रुति-स्मृति तथा कार्य का वाचारंभणत्व भी किसी सद्रूप अधिष्ठान के रहने पर ही संभव हो सकता है, इस युक्ति३ से भी सर्वाधिष्ठानभूत परमार्थतत्व सत् ही हो सकता है, असत् नहीं। अतः 'अर्थक्रियाकारित्व का अभाव वस्तु की असत्ता का कारण है'-यह हेतु असिद्ध है। यदि

१. (श्वे. उ. ४।१०) २. (भ. गी. ९।१०) ३. (ब्र. सू. २।१।१४)