उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर
Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)
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Read in context२७० उपदेशसाहस्री ध्रुव (स्थिर, कूटस्थ) और अनित्य (क्षणिक) वस्तुओं का न तो किसी अन्य से सम्बन्ध होता है और न ही परस्पर-सम्बन्ध होता है। उसी तरह उनमें किसी कार्य का होना भी संभव नहीं है। इसलिये परमार्थतः कोई किसी का सम्बन्धी अभीष्ट नहीं है। तात्पर्य यह है कि स्थिर पदार्थ में विकार न हो सकने के कारण और क्षणिक पदार्थों का अन्य पदार्थ के साथ सम्बन्ध होने के काल तक रहना असंभव होने के कारण स्थिर-अस्थिर पदार्थों के परस्पर सम्बन्धित्व का होना संभव नहीं है, क्योंकि सम्बन्धि-सम्बद्धत्व और असंबद्धत्व इत्यादि विकल्प उपस्थित होंगे। अतएव उनमें कार्य का होना उपपन्न नहीं है। इस पर भी यह शंका होती है कि आत्मा का अन्य किसी के साथ सम्बन्ध नहीं है, यह कैसे कहा जा रहा है ? क्योंकि आत्मा को वेदान्तवाक्यरूप प्रमाण का प्रमेय मानते हैं। उक्त शंका का समाधान इस प्रकार किया गया है कि यह आत्मतत्त्व (आत्मस्वरूप) स्वयं निरुपाधिक है। वह निरुक्ति (वेदान्तवाक्य) का मुख्यवृत्ति से विषय नहीं है। क्योंकि शब्द के प्रवृत्त होने में निमित्तभूत कोई धर्म उसमें नहीं है। किन्तु उसमें शब्द का पर्यवसान लक्षणा के द्वारा मानकर उसे वेदान्तवाक्यरूप प्रमाण का प्रमेय कहा जाता है। वस्तुतः वह आत्मतत्त्व वेदान्तवाक्य का भी विषय नहीं है ॥२४॥ समं तु तस्मात्सततं विभातवद्द्वयाद्विमुक्तं सदसद्विकल्पितात् । निरीक्ष्य युक्त्या श्रुतितस्तु बुद्धिमानशेषनिर्वाणमुपैति दीपवत् ॥२५॥ सममिति—यही कारण है कि समस्वरूप, नित्य प्रकाशमय तथा 'सत्-असत्-विकल्पमय द्वैत' से शून्य जो 'आत्मा' है, उसका श्रुति और युक्ति से साक्षात्कार करके बुद्धिमान् पुरुष 'दीपक' के निर्वाण के समान सम्पूर्ण बन्धनों से मुक्त होकर निर्वाण को प्राप्त हो जाता है ॥ २५ ॥ हृदयस्पर्शिनी सत्-असत् विकल्परूप द्वैत से रहित समस्वरूप, नित्यप्रकाशमय उस आत्मतत्त्व का श्रुति और युक्ति से साक्षात्कार करके बुद्धिमान् पुरुष, दीपक के समान सहसैव समस्त बन्धनों से मुक्त हो जाता है। अर्थात् निरीक्षण और निर्वाण दोनों के बीच कोई व्यवधान नहीं रहता है ॥ २५ ॥ अवेद्यमेकं यदनन्यवेदिनां कुतार्किकाणां च सुवेद्यमन्यथा । निरीक्ष्य चेत्थं त्वगुणग्रहोऽगुणं न याति मोहं ग्रहदोषमुक्तितः ॥२६॥ अवेद्यमिति—किसी अन्य पदार्थ को जो लोग 'आत्मा' से भिन्न नहीं देखते, ऐसा वह अद्वितीय आत्मतत्त्व उनके ज्ञान का विषय नहीं है। अन्यथा वह कुतार्किकों के लिये भी सुवेद्य हो जायगा। शरीर आदि में अभिनिवेश न रखने वाला पुरुष निर्विशेष आत्मा का साक्षात्कार करके मिथ्याज्ञान रूप दोष से मुक्त हो जाता है, अतएव वह मोहित नहीं होता है ॥ २६ ॥ हृदयस्पर्शिनी उक्त लक्षण वाले आत्मतत्त्व का निरीक्षण विषयत्वेन होता है या अविषयत्वेन ?—ऐसी जिज्ञासा होनेपर 'अविषयत्वेनैव' होता है, यह बताया जा रहा है। सर्वसाक्षीभूत प्रत्यगात्मा से भिन्न अद्वय ब्रह्म नहीं है, ऐसा जो जानते हैं, उन अनन्यवेदियों के ज्ञान का वह विषय नहीं है। अन्यथा वह आत्मतत्त्व कुतार्किकों के लिये भी परिच्छिन्नतया सुज्ञेय हो जायेगा। अर्थात् शास्त्र, युक्तिविचार आदि के प्रयास के बिना ही अपनी बुद्धि के अनुसार सुखबोध्य हो जायगा। शरीर (देह) आदि के अभिमान से रहित हुआ पुरुष इस प्रकार निर्विशेष आत्मतत्त्व का अपरोक्षतया अनुभव कर (साक्षात्कार कर) मिथ्याज्ञानरूप दोष से मुक्त होने के कारण पुनः मोह को प्राप्त नहीं होता है ॥ २६ ॥ अतोऽन्यथा न ग्रहनाश इष्यते विमोहबुद्धेर्ग्रह एव कारणम् । ग्रहोऽप्यहेतुस्त्वनलस्त्वनिन्धनो यथा प्रशान्ति परमां तथा व्रजेत् ॥२७॥