BharatKosha
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

Page 297 of 364

Read in context
Page 297

तृष्णाज्वरनाशकप्रकरणम् २७१ अत इति—मिथ्या ज्ञान (अज्ञान) का नाश 'आत्मज्ञान' से ही होता है, तदतिरिक्त किसी अन्य के ज्ञान से नहीं होता। 'मोह' का कारण एकमात्र मिथ्या ज्ञान (अज्ञान) ही है। जिस प्रकार ईंधन (काष्ठ-तृण आदि) से रहित अग्नि स्वयं शान्त हो जाता है, उसी प्रकार अपनी उत्पत्ति के कारण से रहित हो जाने पर मिथ्या ज्ञान (अज्ञान) की भी आत्यन्तिक निवृत्ति हो जाती है॥ २७॥ हृदयस्पर्शिनी इतने महान् प्रयत्न से अविषयतया ब्रह्मात्मज्ञान का होना क्यों अभीष्ट है ? इसका समाधान यह है कि आत्मज्ञान से भिन्न किसी अन्य हेतु से मिथ्याज्ञान की निवृत्ति नहीं होती है। श्रुति ने भी इसी को बताया है¹। मिथ्या- ज्ञान ही मोहबुद्धि (देह, गृह आदि में मैं-मेरा इस प्रकार की अभिनिवेशबुद्धि) का कारण है। जिस प्रकार ईंधन रहित अग्नि शान्त हो जाता है, उसी प्रकार अपने कारण से रहित हुआ मिथ्या ज्ञान भी आत्यन्तिक रूप से निवृत्त हो जाता है ॥ २७ ॥ विमथ्य वेदोदधितः समुद्धृतं सुरैर्महाब्धेस्तु यथा महात्मभिः । तथाऽमृतं ज्ञानमिदं हि यैः पुरा नमो गुरुभ्यः परमीक्षितं च यैः ॥२८॥ विमथ्येति—पहिले किसी समय उदारचरित्र देवताओं ने समुद्र का मन्थन करके जिस प्रकार अमृत प्राप्त किया था, उसी प्रकार वेदसमुद्र का मन्थन कर उससे इस ज्ञानामृत को जिन्होंने निकाला तथा परमात्मा का भी साक्षा- त्कार किया, उन गुरुचरणों में हमारा प्रणाम है ॥ २८ ॥ हृदयस्पर्शिनी प्रकरण समाप्ति पर पुनः गुरुनमस्काररूप मङ्गलाचरण किया जा रहा है। जिस प्रकार सुदूर पूर्वकाल में महात्मा देवताओं ने क्षीरसागर का मन्थन करके अमृत प्राप्त किया था, उसी प्रकार जिस गुरुदेव ने वेदरूप महान् सागर का मन्थन करके इस ज्ञानामृत का उद्धार किया, और परमात्मा का साक्षात्कार किया, उस गुरुदेव को प्रणाम हैं। अथवा निमित्तभूत जिस गुरुदेव के कारण मैं परब्रह्म का साक्षात्कार कर पाया, उस गुरुदेव को प्रणाम हैं। श्रुति भी कह रही है कि “तस्मादात्मज्ञं ह्यर्चयेद्भूतिकामः²” तथा भागवतकार ने भी कहा है— “निरपेक्षं मुनिं शान्तं निर्वैरं समदर्शनम् । अनुव्रजाम्यहं नित्यं पूयेयमङ्घ्रिरेणुभिः³ ॥” २८ ॥ ॥ इति एकोनविशंणतृष्णाज्वरनाशकप्रकर समाप्तम् ॥ ॥ इति श्रीमदाद्यशंकराचार्यविरचितोपदेशसाहस्र्याः पद्यप्रबन्धस्य वैद्य-मुसलगाँवकरोपनामकेन श्रीगजानन- शास्त्रिणा विरचिता 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दीव्याख्या पूर्णताङ्गता ॥ ॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥ १. “नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ।”—( श्वे. उ. ३।८।६, १५ ) २. ( मुं. उ. ३।१ ) ३. ( श्रीमद्भागवद्-११।१४।१६ )