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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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शिष्यानुशासनप्रकरणम् २७७ परीक्षित किये हुए शिष्य को आचार्य कृपा करके ही इस ब्रह्मविद्या को दे। यहाँ यह शंका हो सकती है कि आचार्य के पास जाने की क्या आवश्यकता है ? जिज्ञासु व्यक्ति स्वयमेव न्यायादि का अनुसरण कर ब्रह्मविद्या को पा सकेगा। किन्तु यह विचार ठीक नहीं है, क्योंकि श्रुति-स्मृति के वचन हैं। जिज्ञासु व्यक्ति विद्याप्राप्त्यर्थ यदि पूर्वोक्त कष्ट सहन न करे और स्वयं ही न्यायादि का अनुसरण कर विद्या प्राप्त करना चाहे, तो उससे उसे यथार्थ ज्ञानप्राप्ति न हो सकेगी। श्रुति कहती है कि—'आचार्यवान् पुरुषो वेद', १ आचार्याद्धैव विद्या विदिता', २-आचार्यवान् पुरुष को ज्ञान होता है, विद्या आचार्य से ही जानी जाती है। स्मृति कह रही है कि 'आचार्यः प्लावयिता तस्य सम्यग्ज्ञानं प्लव इहोच्यते', ३ 'उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानम्' ४ इति। 'आचार्य से प्राप्त हुई विद्या ही प्रामाणिक विश्वासार्ह होती है' ५—यह वाक्यशेष भी है। गीता में भी बताया गया है कि 'तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया। उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥' ६— उस मोक्षप्रद ज्ञान को गुरुओं से प्रणिपात, परिप्रश्न और शुश्रूषा द्वारा जानो, वे तत्त्वदर्शी ज्ञानी तुम्हें योग्य समझकर तत्त्व का उपदेश देंगे। तथा च अतिसूक्ष्म परमार्थ का निर्णय केवल अपनी बुद्धि के बल पर कर लेना सम्भव नहीं है, यह निष्कर्ष उपर्युक्त वाक्यों से अवगत हो रहा है ॥ ३ ॥ शिष्यस्य ज्ञानाग्रहणं च लिंगैर्बुद्ध्वा तद्ग्रहणहेतूनधर्मलौकिकप्रमादनित्यानित्यवस्तुविवेक- विषयासञ्जातदृढपूर्वश्रुतत्वलोकचिन्तावेक्षणजात्याद्यभिमानादींस्तत्प्रतिपक्षैः श्रुतिस्मृतिविहितैरपनयेद- क्रोधादिभिः अहिंसादिभिश्च यमैः, ज्ञानाविरुद्धैश्च नियमैः ॥४॥ हृदयस्पर्शिनी शिष्यस्येति—पूर्वोक्त विशेषणों से विशिष्ट जिज्ञासु शिष्य को एक बार के ही उपदेश से सुदृढ़ ज्ञान हो ही जायेगा, तब पुनः पुनः उपदेश करने के लिए क्यों कहा गया है ? इसके उत्तर में आचार्य बता रहे हैं कि शिष्य के मुखादि की आकृति, चेष्टा, वाग्-व्यापार आदि चिह्नों से उसे अभी ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो पायी है, यह जानकर ज्ञानप्राप्ति में प्रतिबन्धक जो सञ्चित, क्रियमाण पाप, यथेच्छ भाषण, यथेच्छ भक्षण एवं यथेच्छाचार आदि प्रमादरूप अधर्म का सूर्यादि देवतोपासनादि नियमों का उपदेश देकर क्षपण करना चाहिए। वर्ज्य-अवर्ज्य का धर्मशास्त्र के द्वारा उपदेश देकर प्रमाद को दूर कराना चाहिये। अर्थात् ज्ञानप्राप्ति में जो प्रतिबन्धक बन रहे हैं, उनका श्रुति-स्मृतिविहित उपायों से अपनयन कराना चाहिए। नित्यवस्तु आत्मा और अनित्यवस्तु अनात्मा के विषय में जो पूर्णतया श्रवण नहीं कर पाया, उसे युक्तिविशेष आदि के द्वारा बताकर नित्यानित्यवस्तु के विवेक को दृढ़ कराना चाहिये। तथा लोगों के व्यवहार में शुभाशुभ का (साधुत्वासाधुत्व का) विचार करते रहना अथवा लोगों से पूजा-सम्मान आदि की इच्छा से उनपर अनुग्रहादि व्यवहार करना आदि लोकचिन्तावेक्षण को वक्ष्यमाण अमानित्व, अदम्भित्व आदि शास्त्रीय उपदेश देकर दूर कराना चाहिये। तथा अपनी जाति, कुल, विद्या का अभिमान और तत्प्रयुक्त अन्यधिक्करणादि दुर्व्यवहारों को त्वं-पदार्थ के परिशोधनोपदेश से दूर कराना चाहिये। इस प्रकार पूर्वोक्त प्रतिबन्धकों को उनके प्रतिपक्षी श्रुतिस्मृतिविहित अक्रोध, अकाम, अमोह आदि और अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह ७, इन पाँच यमों से (अक्रोधादि के साथ इनका उपायोपेय भावसम्बन्ध है। अक्रोधादि उपाय है और अहिंसादि उपेय हैं) तथा ज्ञाननिष्ठा के अविरोधी नियमों से (शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान ८ पाँच इन नियमों को ज्ञाननिष्ठा के अविरोधी कहने का तात्पर्य १. (छां. उ. ६।१४।२) २. (,, ,, ४।९।३) ३. (स्मृति—तुलना मो. ध. ३२७।२३) ४. (भ. गी. ४।३४) ५. आचार्याद्धैव विद्या विदिता साधिष्ठं प्रापत् ।—(छां उ. ४।९।३) ६. (भ. गी. ४।३४) ७. (यो. सू. २।३०) ८. (,, ,, २।३२)