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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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२७८ उपदेशसाहस्री यह है कि इनमें तीर्थयात्रा, चान्द्रायणादि कर्मकाण्डप्रधान नियम ज्ञाननिष्ठा के विरोधी हैं, क्योंकि अधिक आयास- साध्य होने के कारण वे विक्षेप के हेतु हैं) निवृत्त करावे। समस्त दोषों के निरास करने में यम-नियमादि साधारण उपाय हैं ॥ ४ ॥ अमानित्वादिगणं* च ज्ञानोपायं सम्यग्ग्राहयेत् ॥५॥ हृदयस्पर्शिनी अमानित्वादिगणमिति—इस प्रकार ज्ञानग्रहण में प्रतिबन्धकों के निवर्तक उपायों को बताकर अब ज्ञानग्रहण के उपायों को बता रहे हैं—ज्ञान के उपायभूत अमानित्व, अदंभित्व आदि गुणों को अच्छी तरह से ग्रहण करवावे। उसी तरह 'अद्वेष्टा सर्वभूतानाम्'१ इत्यादि वाक्यों से उक्त अद्वेष्टृत्वादि धर्मों का भी पालन करवावे। इस रीति से समस्त दोषों का परिहार होनेपर दृढ़ ज्ञान अनायास लभ्य हो जाता है। एक बार श्रवण करने मात्र से विद्या दृढ़ नहीं हो पाती। क्योंकि 'आवृत्तिरसकृदुपदेशात्'२ इस न्याय से तथा श्रवणोत्तरकाल में मनन का विधान करने से फल प्राप्ति तक विद्या की दृढ़ता विवक्षित है। अतः शिष्य को कृतार्थ करने में प्रवृत्त हुआ अथवा विद्या का उपयोग करने में प्रवृत्त हुआ गुरु अपने शिष्य को इतना निःसन्दिग्ध ज्ञान करा दे, जिससे कि वह फलोत्पादक हो सके। इसलिये शिष्यकल्याणार्थं आचार्य पुनः पुनः अवश्य ही उपदेश करता रहे ॥ ५ ॥ आचार्यश्चोहापोहग्रहणधारणशमदमदयानुग्रहादिसम्पन्नो लब्धागमो दृष्टादृष्टभोगेष्वनासक्तस्त्यक्त- सर्वकर्मसाधनो ब्रह्मवित् ब्रह्मणि स्थितोऽभिन्नवृत्तो दंभदर्पकुहकशाठ्यमायामात्सर्यानृताहंकारममत्वादि- दोषविवर्जितः केवलपरानुग्रहप्रयोजनो विद्योपयोगार्थी। पूर्वमुपदिशेत्— “सदेव सोम्येदमग्र आसीदेक- मेवाद्वितीयम्”, “यत्र नान्यत्पश्यति”, “आत्मैवेदं सर्वम्”, “ब्रह्मैवेदं सर्वम्”, “आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्”, “सर्वं खल्विदं ब्रह्म” इत्याद्या आत्मैक्यप्रतिपादनपराः श्रुतीः ॥६॥ हृदयस्पर्शिनी आचार्यश्चेति—इस प्रकार आचार्य के कर्तव्य को बताकर अब उसके लक्षण को बतलाते हुए उपदेश का क्रम बताते हैं—तत्त्वजिज्ञासु अधिकारी शिष्य एवंगुणविशिष्ट आचार्य के समीप जाय। जो वैसा न हो उसके समीप न जाय, यह प्रदर्शित करने के लिये यह बताया जा रहा है। आचार्य के लिए वह एवंविध गुणों से विशिष्ट होने का प्रयत्न करे ऐसा कोई विधान नहीं किया जा रहा है, क्योंकि वह तो कृतार्थ हो चुका है। ऊहापोह, ग्रहण, धारण, शम, दम, दया और अनुग्रह आदि गुणों से सम्पन्न, शास्त्रज्ञ, ऐहिक और पारलौकिक भोगों से विरक्त, सर्वविध कर्मसाधनों को त्यागनेवाले, ब्रह्मवेत्ता, ब्रह्मनिष्ठ, लोकमर्यादा का उल्लंघन न करनेवाले तथा दंभ, दर्प, कुहक (दूसरे को धोखा देना), कुटिलता, माया (दूसरे को मोह में डाल देना), मात्सर्य (गुण में दोषदृष्टि), मिथ्याभाषण, अहंकार, और ममता आदि दोषों से रहित, केवल परोपकाररूप प्रयोजनवाले एवं अपनी विद्या का उपयोग करने की इच्छावाले आचार्य सर्वप्रथम आत्मा का एकत्वप्रतिपादन करनेवाली इन श्रुतियों का उपदेश करे—"हे सोम्य ! पहले यह एक अद्वितीय सत् ही था३", "जहाँ किसी अन्य को नहीं देखता४", "यह सब आत्मा ही है५", "पहले यह एक आत्मा ही था६", "निश्चय यह सब ब्रह्म ही है७" इत्यादि। ऊहा=शिष्य के बिना पूछे ही उसका भाव जान लेना, अथवा १. (भ. गी. १२।१३-२०) २. (ब्र. सू. ४।१।१) ३. (छां. उ. ६।२।१) ४. (छां. उ. ७।२४।१) ५. (छां. उ. ७।२५।२, तथा बृ. उ, ४।४।६) ६. (ऐ. उ. १।१) ७. (छां. उ. ३।१४।१)

  • गुणं-पाठान्तरम् ।