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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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२८६ उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी तज्जातमिति—इस प्रकार उपोद्घात के रूप में शरीरोत्पत्ति को बताकर उसके आगे बताते हैं—वह उत्पन्न हुआ शरीर जातकर्मादि संस्कारों से नाम और रूप प्राप्त कर पुनः मंत्रों से संस्कृत होने पर उपनयन संस्कार के द्वारा 'ब्रह्मचारी' संज्ञा को प्राप्त करता है। पश्चात् वही शरीर पत्नी-ग्रहणरूप संस्कार के द्वार 'गृहस्थ' संज्ञा को प्राप्त करता है। पुनः वही वानप्रस्थ संस्कार के द्वारा 'वानप्रस्थ' संज्ञा को प्राप्त करता है। पश्चात् वही सर्वकर्मपरित्याग- निमित्तरूप संस्कार के द्वारा 'संन्यासी' संज्ञा को प्राप्त करता है। इस प्रकार विभिन्न जाति, कुल और संस्कारवाला यह शरीर तुझसे पृथक् है ॥ २१ ॥ मनश्चेन्द्रियाणि च *नामरूपात्मकान्येव, “अन्नमयं हि सोम्य मनः” इत्यादिश्रुतिभ्यः ॥२२॥ हृदयस्पर्शिनी मन इति—इसके अतिरिक्त “हे सोम्य ! मन अन्नमय ही है”१ इत्यादि श्रुतियों के अनुसार मन और इन्द्रियाँ भी नाम-रूपात्मिका ही हैं ॥ २२ ॥ कथं चाहं भिन्नजात्यन्वयसंस्कारवर्जित इत्येतच्छृणु—योऽसौ नामरूपयोर्व्याकर्ता नामरूप†- विलक्षणः, स एव नामरूपे व्याकुर्वन्-सृष्ट्वेदं शरीरं स्वयं ‡संसारधर्मवर्जितो नामरूप इह प्रविष्टोऽन्यैरदृष्टः स्वयं पश्यन्, तथाऽश्रुतः शृण्वन्, अमतो मन्वानः, अविज्ञातो विजानन्, “सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरो नामानि कृत्वाऽभिवदन्यदास्ते” इत्यस्मिन्नर्थे श्रुतयः सहस्रशः—“तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्”, “अन्तः प्रविष्टः शास्ता जनानाम्”, “स एष इह प्रविष्टः”, “एष त आत्मा”, “स एतमेव सीमानं विदार्येतया द्वारा प्रापद्यत”, “एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा”, “सेयं देवतैक्षत हन्ताहमिमास्तिस्रो देवताः” “अशरीरं शरीरेषु” इत्याद्याः ॥२३॥ हृदयस्पर्शिनी कथमिति—तुमने जो पूछा था कि मैं अनात्मभूत जाति, कुल एवं संस्कारों से रहित किस प्रकार हूँ ? उसे भी इस प्रकार सुनो—यह जो नाम-रूप के धर्मों से विलक्षण नाम-रूप को व्याकृत (व्यक्त) करने वाला है, वही नाम-रूप को व्यक्त करते हुए इस शरीर को रचकर स्वयं संस्कार और धर्मों से रहित हुआ ही दूसरों से अदृष्ट किन्तु स्वयं देखता हुआ, दूसरों से अश्रुत किन्तु स्वयं सुनता हुआ, तथा मन का अविषय होकर भी मनन करता हुआ और अविज्ञात होकर भी सबको जानता हुआ इन नाम और रूपों में प्रविष्ट हो गया है, जैसे “बुद्धिमान् पुरुष सम्पूर्ण रूपों की रचना कर उनके देव-मनुष्य आदि नाम रखकर उनके द्वारा बोलता (व्यवहार करता) हुआ स्थित रहता है”२ इस श्रुति के दृष्टान्त से उपर्युक्त कथन स्पष्ट हो जाता है। इसी अर्थ में “उसे रचकर उसी में अनुप्रविष्ट हो गया”३, “आत्मा सबके भीतर प्रविष्ट होकर सब जीवों का शासन करने वाला है”४, “वह आत्मा इस शरीर में प्रविष्ट है”५, “यह तेरा आत्मा है”६, “वह इस मूर्द्धसीमा को विदीर्णकर इसके द्वारा प्रविष्ट हो गया”७, “वह आत्मा समस्त प्राणियों में छिपा हुआ है”८, “उस (सत्स्वरूप) देवता ने ईक्षण किया कि अहा ! मैं इन तीन (अप्, तेज और अन्न) देवताओं को प्रकाशित करूँ”९ इत्यादि सहस्रों श्रुतियाँ उपलब्ध हैं। जैसे पक्षी अपने नीड (घोसले) में प्रविष्ट होता है तो वह सबको उपलब्ध भी होता है, वैसे ही परमात्मा यदि यहाँ सर्वत्र प्रविष्ट है तो वह सबको उपलब्ध क्यों नहीं होता ? इस शंका का समाधान “अन्यैरदृष्टः” से हो जाता है। “अदृष्टो द्रष्टा”—(बृ. आ. ३।७।२३) श्रुति को मूल में अर्थतः दिया गया है ॥ २३ ॥ १. “अन्नमयं हि सोम्य मनः” (छां. उ. ६।५।४) ६. (बृ. उ. ३।७।३) २. (तै. आ. ३।१२।७) ७. (ऐ. उ. ३।१२) ३. (तै. उ. २।६) ८. (कठ उ. १।३।१२) ४. (तै. आ. ३।११) ९. (छां. उ. ६।३।२) ५. (बृ. उ. १।४।७) * रूपकाण्येव—पाठान्तरम् । † रूपधर्म वि० —पाठान्तरम् । ‡ संस्कार धर्म—पाठान्तरम् ।