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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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शिष्यानुशासनप्रकरणम् २८७ स्मृतयोऽपि—"आत्मैव देवताः सर्वाः"१, "नवद्वारे पुरे देही"२, "क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि"३, "समं सर्वेषु भूतेषु"४, "उपद्रष्टानुमन्ता च"५, "उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः"६, "अशरीरं शरीरेषु" इत्याद्याः । तस्माज्जात्यन्वयसंस्कारवर्जितस्त्वमिति सिद्धम् ॥२४॥ हृदयस्पर्शिनी स्मृतयोऽपीति—परमात्मा ही क्षेत्रज्ञ है—इस श्रुतियुक्त अर्थ को बताने के लिये स्मृतिवचनों को भी उद्धृत कर रहे हैं । "सब देवता आत्मा ही हैं"१, "नौ द्वार के पुर में देही रहता है"२, "क्षेत्रज्ञ भी मुझे ही जान३", "सब भूतों में समानरूप से स्थित"४, "उपद्रष्टा और अनुमन्ता"५, "उत्तम पुरुष तो अन्य ही है६", "जो शरीरों में अशरीरी है७" इत्यादि स्मृतियाँ भी हैं। इससे यह सिद्ध हुआ कि तू जाति, कुल और संस्कारों से रहित है। 'इत्यादि' के 'आदि' शब्द से "स पर्य्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम्"८ को भी संगृहीत किया समझना चाहिये ॥ २४ ॥ स यदि ब्रूयात्—अन्य एवाहमज्ञः सुखी दुःखी बद्धः संसारी, अन्योऽसौ मद्विलक्षणोऽसंसारी देवः, तमहं बल्युपहारनमस्कारादिभिर्वर्णाश्रमकर्मभिश्चाराध्य संसारसागरादुत्तितीर्षुरस्मि—कथमहं स एव ? इति ॥२५॥ हृदयस्पर्शिनी स यदीति—'परमात्मा और तू एक ही हैं—इस अभेदोपदेश से जीव को जाति, कुल, संस्कारराहित्य का निश्चय कराया गया किन्तु स्वानुभवविरोध की आशंका की जा रही है। शिष्य यदि यह आशंका करे कि मैं अज्ञानी, सुखी, दुःखी, बद्ध संसारी जीव तो अन्य हूँ, किन्तु यह असंसारी देव मुझसे भिन्न ही है। अतः मैं पूजा (बलि) उपहार और प्रणामादि के द्वारा तथा अपने वर्णाश्रमविहित कर्मानुष्ठान से उसकी आराधना करके इस संसारसागर से पार होना चाहता हूँ। मैं साक्षात् वही कैसे हो सकता हूँ? क्योंकि मैं तो अज्ञ हूँ, यह अज्ञता मेरी अनुभवसिद्ध है। और उससे विलक्षण ईश्वरतत्त्व है—यह श्रुति-स्मृतियों के द्वारा बताया गया है। अतः आत्मा और परमात्मा को अभिन्न कैसे समझा जाय ? उत्कृष्ट ईश्वर को निकृष्ट संसारी के रूप में देखने पर प्रत्यवाय भी होगा। अतः उसका अनुग्रह प्राप्त करने के लिये मुझे उसकी आराधना ही करना उचित होगा। उसके अनुग्रह से ही मैं संसार से मुक्त हो सकूँगा ॥ २५ ॥ आचार्यो ब्रूयात्—नैवं सोम्य, प्रतिपत्तुमर्हसि—प्रतिषिद्धत्वाद्वैतप्रतिपत्तेः। कथं प्रतिषिद्धा भेदप्रतिपत्तिरित्यत आह—"अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद", "ब्रह्म तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद", "मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति" इत्येवमाद्याः ॥२६॥ हृदयस्पर्शिनी आचार्य इति—शिष्य की भ्रमपूर्ण आशंका को सुनकर आचार्य को कहना चाहिये कि 'हे सोम्य ! तुझे ऐसा नहीं समझना चाहिये। क्योंकि भेदज्ञान की निन्दा की गई है।' यदि कोई ऐसा आक्षेप करे कि भेद तो प्रत्यक्ष- १. ( मनुस्मृति १२।११९ ) २. ( भग. गी. ५।१३ ) ३. ( भग. गी. १३।२ ) ४. ( भग. गी. १३।२७ ) ५. ( भग. गी. १३।२२ ) ६. ( भग. गी. १५।१७ ) ७. ( सूत सं. २।११।६७ ) ८. ( ईश. उ. ८ )